# Ep 61 - AMAVASYA KA KHAUF - PART 2 | SPOOKCAST ORIGINAL STORY | Horror Story | Hindi Horror Podcast |

An episode of [SPOOKCAST - A Hindi Horror Podcast](https://invisiblenetwork.ai/podcast/1767172215), 11 Nov 2025, 41 min.

Audio: https://anchor.fm/s/f51bcf74/podcast/play/111032929/https%3A%2F%2Fd3ctxlq1ktw2nl.cloudfront.net%2Fstaging%2F2025-10-11%2F412282020-44100-2-6f5bd4a8c5256.m4a

Story: A spine-chilling tale of the cursed Bonpukur Dighi, a haunted pond that hides a deadly secret. Each Amavasya, someone dies. When a new teacher arrives in Bonpukur, disbelief turns to terror as legend becomes real. To know the truth… listen to this Original Audio Horror Story by Spookcast. | SpookCast | Horror Story | Bhoot | Horror Kahaniya | Horror Podcast | Hindi Horror Podcast | Murdaghar | Haunted Hospital | Real Incidents | Chudail | Chureil |Halloween Special | Shakchunni | Haunted School | Haunted Hostel |Haunted Jail | Dayan | Story and Narration by : Manjila SOUND and Graphics : Manjila Send your stories to KahaniSTVO@gmail.com/ or DM us on Instagram @spookcastoriginals Sound Effect from Pixabay and Freesound.org Say hi to us on Instagram! We would love to connect with you guys! https://www.instagram.com/spookcastoriginals/ Listen to the new Episode of Faadu Friday on Spotify: https://open.spotify.com/show/5po5YbzaWDIOclOcOE8kq5 Find us on Youtube: https://www.youtube.com/@SpookcastOriginals

## Transcript

[0:03] दोस्तों नमस्कार, मैं हूँ मंजुला और आज हम आपके लिए लाए हैं
[0:08] अमावस्या का खौफ। इस कहानी का दूसरा और आखिरी भाग
[0:13] अगर आपने इस कहानी का पहला भाग अब तक नहीं सुना है तो पहले जाइए और
[0:18] उसे सुनिए। तभी आप कहानी के इस भाग को पूरी
[0:22] तरह समझ पाएंगे। इस कहानी में कुछ इंटेंस ग्राफिक
[0:26] और एलिमेंट्स भरे हुए हैं, जो कुछ लोगों के लिए काफी डिस्टर्बिंग हो
[0:31] सकते हैं। सो अगर आप कमजोर दिल के हैं या
[0:35] ग्राफिक और सीन्स को बर्दाश्त नहीं कर सकते।
[0:38] तो आप आज की कहानी को स्किप कर सकते हैं।
[0:41] तो चलिए अब बिना किसी देरी के आज का एपिसोड शुरू करते हैं।
[0:47] सुनते रहिए स्पूककास्ट अभी और मंजिला के साथ।
[0:58] औरकों के पैर कांप रहे थे, उसकी सांसे तेज हो गई थी।
[1:04] वो कटा हुआ सर पानी में हल्का हल्का तैरता हुआ उसके पास आ रहा
[1:10] था। हवा में सड़े हुए मांस की
[1:13] दुर्गन्ध पूरी तरह से फ़ैल चुकी थी पर जाते हुए भी।
[1:18] अब वो भाग नहीं पा रहा था मानो उसके पैर जमीन में धंस चूके हो।
[1:25] वो बसातन भरी नजरों से उसकते हुए सिर को देख रहा था और तभी तभी उसे
[1:34] वो आवाज सुनाई दी। एक हँसी एक बहुत ही डरावनी औरत की
[1:44] हँसी जो आप वहाँ गूंद रही थी और को नहीं आसपास देखा वहाँ वहाँ कोई
[1:53] नहीं था पर वो डरावनी आवाज। अब पढ़ती ही जा रही थी।
[2:00] मानो कोई अदृश्य शक्ति उसके पास आ रही हो और उस आवाज़ को सुन उस कटे
[2:06] हुए सर को अपने पैरों के इतनी पास आता देख और उस विभत से सड़े हुए
[2:12] मांस की दुर्गन्ध को सून और को। अब अपने अंदर उठ रहे आतंक की लहर
[2:18] को नहीं रोक पा रहा था और डर से डर से वो बेहोश हो गया।
[2:31] सुबह की पहली किरण जब वो घर के पानी पर पड़ी।
[2:35] तोरकों ने धीरे धीरे अपनी आँखें खोली।
[2:39] उसके कपड़े गंदे थे, मिट्टी से सने हुए सर में भी हल्का सा दर्द
[2:44] था, वो खुद को संभाले हुए उठा और जैसे ही उसने पोखर के पानी को
[2:50] देखा उसे कल रात की पूरी बात। एक दम से याद आने लगी और वो
[2:57] परेशान हो उठा। वो घर के पानी में अब कुछ नहीं
[3:02] था, ना कोई कटा हुआ सिर, ना कोई टूटा हुआ नारियल।
[3:07] फिर फिर उसने कल रात वो क्या लिखा था और को सूझने लगा?
[3:14] कुछ चूड़ियों की आवाज़, वो डरावनी हँसी, वो सब क्या था और को परेशान
[3:20] हो उठा। उसे लॉजिकल बातों पर यकीन था पर
[3:24] उसके पास अपने इन सब सवालों का कोई जवाब नहीं था और ये बात उसे
[3:30] अब अंदर से कहा रही थी। उसने खुद को संभालना और सीधा
[3:35] स्कूल की तरफ निकल पड़ा। वो दिन उसका बिना किसी हादसे के
[3:49] गुजरा। बच्चों की ग्लास कागज कॉपी।
[3:53] चौक की आवाज़ बस रोज़ की ही चीजें पर अंदर ही अंदर पूरे दिन उसके
[3:59] दिमाग में वो पोखर वाली बार बार बार घूम रही थी शाम को स्कूल के
[4:08] बाद। औरको और बादल पास के ही एक चाय की
[4:11] दुकान पर चाय पी रहे थे। बासी कुछ बुजुर्ग बैठे पोखर में
[4:16] हुए मौतों के बारे में बातें कर रहे थे।
[4:19] लाहिरी दा की बात हो रही थी जिनकी लाश कुछ दिनों पहले ही पोखर से
[4:24] मिली थी। जीस लाश को औरको ने भी देखा था।
[4:28] तो और और बादल वहीं बैठे उनकी बातें सुनने लगे।
[4:33] पता नहीं तुम लोग मेरी बात पर विश्वास करोगे या नहीं, लेकिन
[4:39] लेकिन अब मुझे विश्वास है कि वो शक चुन्नी मौत से पहले संकेत देती
[4:46] है। लाहिरी ने करीब 20 दिन पहले ही इस
[4:50] बारे में मुझसे कहा था। तब मैंने बात को हल्के में लिया
[4:54] था, पर आज आज जब मैं इस बारे में सोचता हूँ तो तो।
[5:01] कैसा सुन के प्रवीता बताना है तो ठीक से बताओ ना, शुरुआत से।
[5:06] ठीक है, बताता हूँ पिछली पूर्णिमा से कुछ दिन पहले मंदिर के पास जो
[5:14] मेला लगा था ना उसमें लाहरी दाबी गए थे।
[5:18] रात को वो बातचीत करते करते उन्हें बहुत देर हो गई।
[5:22] और टेहरी होने के कारण वो पोखर वाले छोटे रास्ते से अकेले अकेले
[5:27] जल्दी जल्दी घर लौट रहे थे। उस दिन अमावस्या नहीं थी तो
[5:32] उन्होंने ज्यादा कुछ नहीं सोचा। अब वो घर के पास वाले रास्ते पर
[5:37] चलते वक्त अचानक उन्हें ऐसा लगा मानो मानो कुछ।
[5:41] टूटा हो उनकी चप्पल के नीचे तो वो वहाँ रुकिए और चप्पल के नीचे क्या
[5:46] है देखने लगे। तब उन्हें अपनी चप्पल के नीचे एक
[5:52] लाल चोरी का टुकड़ा दिखा। अब उसे देख उस सोचने लगे कि इस
[5:57] रास्ते पर जहाँ आदमी भी आने से डरते हैं क्नॉइस।
[6:01] वह वह ये नलचूटी क्या कर रही थी? वो अपने ख्यालों में खोए ही थे कि
[6:08] तभी उन्हें एक आवाज सुनाई दे काबरा उन्हें ऐसा लगा जैसे कोई
[6:17] पोखर के पास से। का नाम लेकर पुकार रहा हो और
[6:21] उन्हें उन्हें वो आवाज अपनी बीवी जैसी लगी।
[6:26] अब लाहरी दा जानते थे कि उनकी बीवी घर पर थी तो वो आवाज सुन
[6:31] उनका शरीर डर से ठंडा पड़ने लगा। फिर भी उन्होंने हिम्मत कर।
[6:37] एक बार पीछे मुड़कर देखने की सोंची पर उन्हें वहाँ पोखर के पास
[6:42] कोई नहीं दिखा। बस चारों तरफ अंधेरा चिंघु रोग की
[6:47] आवाज और धुंध और उसमें गूंजती वो आवाज जो उनका नाम ले रही थी वो
[6:56] क्नॉइस। वो बहुत डर गए और अपने घर की तरफ
[6:59] दौड़ पड़े। जब 2 दिन बाद मैं उनसे मिला तो वो
[7:04] तब ही परेशान दिख रहे थे। पूछने पर मुझे पूरी बात पता चली
[7:10] से सुनकर मुझे भी डर लगने लगा क्योंकि आज तक लोगों ने अमावस्या
[7:15] के अलावा। बाकी रातों में बस स्पूकर के पास
[7:19] चमेली के फूलों की गन सूंघी थी या उन्हें वहाँ कभी चूड़ियों की
[7:24] खनखनाहट और कभी भयानक सी वो हँसी सुनाई दी थी पर किसी का नाम लिखकर
[7:30] पुकारने वाली बात ये बात उस दिन मैंने पहली बार सुनी थी।
[7:36] इसीलिए मैंने लारी दा को बस पोखर के पास अकेले जाने से मना कर
[7:41] दिया। ना मवस्या को ना कोई और आपको जैसे
[7:45] की लगभग हम सभी वैसे भी कर रहे थे पर उनकी मौत के बाद वो आवाज वाली
[7:51] पार्ट जब मुझे याद आई तक से एक सवाल मेरे दिमाग से चाह ही नहीं
[7:55] रहा। पहले छे मौतों की तरह उस समावस्या
[7:59] से पहले ना लायवी ताको चुगड़ियों की आवाज सुनाई दी, ना हँसी ना
[8:03] चमेली की खुशबू। उन्होंने सिर्फ किसी को अपना नाम
[8:07] पुकारना हुए सुना तू क्या? तो क्या ये भी शकचुन्नी का एक तरह
[8:11] का संकेत था जो हमें आज तक किसी ने बताया ही नहीं?
[8:16] ये बात मुझे तब से खाई जा रही है भगवान करी कोई उस आवाज़ को कभी ना
[8:22] सुने ना किसी और संकेत को क्योंकि वो और कुछ नहीं बस मौत का बुलावा
[8:30] है। प्रविता।
[8:35] ये तो बड़ी चिंता की बात है अगर अगर वो लोगों को नाम लेकर पुकार
[8:40] रही है, पुकार में बुला रही है तो मुझे लगता है कि आपको प्रधान जी
[8:45] से ये बात करनी चाहिए बल्कि अब तक तो आपको उन्हें ये बात बता देनी
[8:50] चाहिए थी। अगर ऐसा सच में हुआ है तो क्नॉइस।
[8:53] पोखर के पास जाना सिर्फ अमावस्या को नहीं, बाकी रातों को भी वहाँ
[8:59] जाना मना होना चाहिए। क्या पता वो कब किसका नाम लेकर
[9:03] पुकारना ज्यादातर लोग तो डर से वैसे भी वहाँ अकेले नहीं जाते पर
[9:08] कितने नए लोग आते हैं गांव में जिन्हें ये सब बातें नहीं पता।
[9:13] इसीलिए जरूरी है इस बात की घोषणा गांव में की जाए।
[9:18] इस नए संकेत की बात सबको पता होनी चाहिए।
[9:24] और को और बादल चुपचाप बैठे ये पूरी बात सुन रहे थे और को का गला
[9:30] डर से सूख चुका था। क्नॉइस।
[9:32] उसने तुरंत बादल से धीरे से कहा जी।
[9:35] जी आवाज़ वाली बात, चूड़ियों और हँसी वाली ये जी किसने सुनी है
[9:40] बादल? बादल का चेहरा बहुत ज्यादा गंभीर
[9:44] हो चुका था मानो वो किसी गहरी चिंता में हो।
[9:48] और खुदा नाम तो मुझे सबकी पता है। पर आपको बोलकर कोई फायदा नहीं है।
[9:55] मतलब क्यों भाई, मैं भी जानना चाहता हूँ मिलना चाहता हूँ उन
[9:59] लोगों से इस बारे में मैं भी बात करना चाहता हूँ।
[10:02] आप आप किसी से नहीं मिल सकते और खुदा।
[10:06] क्यों क्यों नहीं मिल सकता? प्रधान जी ने मना किया है क्या?
[10:10] नहीं। किसी ने मना नहीं किया।
[10:13] आप उनसे नहीं मिल सकते क्योंकि जिसने भी आज तक वो आवाज़े सुनी है
[10:20] वो सब लोग मर चूके हैं। बात की ये शब्द सुन के सर पर मानो
[10:30] बिछुली गिरी। क्या ये क्या बकवास है?
[10:34] इसका इसका क्या मतलब है बादल? देखिए और कोता काऊ वालो का मानना
[10:40] है जीतने लोगों ने भी पोखर के पास से नवाजों को सुना है।
[10:45] उनकी लाश कुछ ही दिनों में या कुछ महीनों में पोखर से मिली है।
[10:52] ये बात समझने में सबको थोड़ा पहले समय लगा पर पहले तीन मौतों के बाद
[10:57] से ये सारे संकेत सब लोग समझने लगे।
[11:01] प्रधान जी ने तो तब हुई बैठक में भी खोदी है।
[11:04] सबको बताया था। यहाँ तक कि पुलिस को भी ये बात
[11:07] पता है पहले कुछ मौतों के बाद। दारोगा बाबू के साले अनिमेष बाबू
[11:13] की नाइट ड्यूटी लगी थी। पोखर पर फिर एक रात उन्होंने भी
[11:18] ये चूड़ी और हँसी की आवाज सुनी। उन्हें फिर वहाँ ड्यूटी करने से
[11:23] मना किया पर अनिमेष बाबू पुलिस में थे।
[11:27] सीनियर कॉन्स्टेबल वो। फिर भी अपनी ड्यूटी करते रहे।
[11:32] हर रात और फिर अभी अमावस्या को उनकी भी सरकटी लाश पोखर से मिली।
[11:40] तब से पुलिस वी पोखर के पास ड्यूटी पेट्रोलिंग कुछ नहीं करती।
[11:45] ऐसा नहीं है कि पुलिस ने आज तक कुछ नहीं किया।
[11:48] पहले तीन मौतों के बाद हर बार पोखर में गोताखोर भुलाकर लाश की
[11:54] सर को ढूंढा गया। पोखर में कोई नुकीली चीज़ है यानी
[11:58] ये भी देखा गया जिससे लाशों के पैर की वो खतरनाक घाव बनते हैं पर
[12:04] किसी को कभी कुछ नहीं मिला। और हेड कॉन्स्टेबल की मौत के बाद
[12:09] उनके मौत के बाद तो पुलिस वालों ने भी गांव वालों की बात पर यकीन
[12:14] करना शुरू कर दिया। अब तो अब तो सिर्फ भगवान ही जानता
[12:19] है। पोखर में इस वक्त चल क्या रहा है?
[12:22] मैं बस आज से रात में क्या? दिन में भी वहाँ नहीं जाऊंगा।
[12:27] बस ये मैंने आठ सोच लिया और आप और को दा आप भी मत जाना, ठीक है?
[12:33] और को ये पूरी बात सुनकर काफी परेशान हो चुका था।
[12:36] उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो वो आगे क्या करे?
[12:40] क्या उसकी भी जान को खतरा था? क्या उससे कल रात वाली बात बादल
[12:46] या प्रधान जी से कहनी चाहिए? उसके जेहन में कई सवाल थे और उसके
[12:52] पास उनका कोई जवाब नहीं था। सो कुछ जो भी रहा उसने उस रात
[12:59] बहुत सोचा और फिर फैसला किया कि बादल ठीक कह रहा है।
[13:04] उसके कहने के मुताबिक अगली अमावस्या तक वो भी बोल पुकुर दिखी
[13:09] के आस पास बिल्कुल नहीं जायेगा। शाक चुन्नी के डर से नहीं पर पर
[13:15] उसे कोई फालतू रिस्क नहीं लेना था।
[13:17] आखिरकार लोगों की सरकटी लाशें हर अमावस्या को पुखरे से मिल तो रही
[13:23] थी ना? और ये उसने खुद भी देखा था।
[13:29] अगले कुछ हफ्तों में औरकों की जिंदगी अपनी रफ्तार पकड़ने लगी और
[13:35] बादल मिलकर बच्चों को पढ़ाते और स्कूल के बाहर कभी कभी बच्चों के
[13:40] साथ शाम को क्रिकेट भी खेलते। वो दोनों लगभग एक जैसे ही थे और
[13:44] जल्द ही दोनों काफी अच्छे दोस्त बन गए।
[13:48] पर औरकों को बादल की एक बात हमेशा घटकती बादल अपने परिवार के साथ
[13:55] भून फुकुर गांव में ही रहता था, पर उसने कभी औरकों को अपने घर
[14:00] नहीं बुलाया। वो बस हमेशा कहता कि उसकी बीवी
[14:04] अपने मायके गई है। फिर कुछ दिन बाद और को को गांव
[14:08] वालों से पता चला कि बादल की बीवी मायके घूमने नहीं गई है।
[14:14] वो तो बादल को छोड़कर चली गई है क्योंकि बादल गुस्से में उस पर
[14:19] कभी कभी हाथ उठाया करता था। और को को ये सुन बड़ा अजीब लगा
[14:24] क्योंकि बादल गुस्सेल नहीं लगता था पर कौन सच बोल रहा था ये ये वो
[14:30] नहीं जानता था ना वो बादल से इस बारे में कुछ पूछना चाहता था तो
[14:34] उसने इस बात को वहीं छोड़ दिया। ऐसे ही समय तेजी से चलता गया और
[14:40] देखते ही देखते। अगली अमावस्या का समय पास आने
[14:45] लगा। अमावस्या के पास आते आते गांव का
[14:52] माहौल बिल्कुल बदलता जा रहा था और कोनी भी अब तक वो आवाज वाली बात
[14:59] किसी को नहीं बताई थी। ना गांव के प्रधान को, ना बादल को
[15:05] और अमावस्या के पास आते आते वो जितनी कोशिश क्यों ना करे उसके मन
[15:10] में डर हर दिन बढ़ता ही रहता। गांव में अब घर घर आतंक का माहौल
[15:17] साफ नजर आने लगा था। बहुत से बच्चे स्कूल नहीं जा रहे
[15:21] थे, स्कूल के बाद खेलने तक नहीं। अमावस्या के चार 5 दिन पहले से ही
[15:27] हर्षा गांव में एक अजीब सा सन्नाटा छाने लगता।
[15:32] बच्चे, बड़े, बूढ़े सब शाम ढलते ही घर लौट आते।
[15:37] दरवाजे और खिड़कियां बंद कर लेते। कोई भी अँधेरा होने के बाद बाहर
[15:42] कदम नहीं रखता। पूरा गांव जैसे साहस रोककर किसी
[15:47] चीज़ का इंतजार कर रहा हो। अलग अलग घरों से शाम को शंख की
[15:53] ओलो की आवाज आती। मानो लोग एक दूसरे को सतर्क रहने
[15:58] की चेतावनी दे रहे हो और ये सब देख और को और भी चैन हो जाता
[16:04] क्योंकि उसने भी तो वो आवाजे सुनी थी जिन्हें सुन लोग अमावस्या के
[16:10] दिन मारे जा रहे थे। उसकी जान को खतरा था।
[16:16] और ये बात को जितना भी ना मानना, चाहे वो इस बात को अनदेखा नहीं कर
[16:22] पा रहा था और देखते ही देखते अमावस्या की रात आ गई उस रात।
[16:35] पूरा गांव डर के साए में था। लोग अपने सारे कामकाज आज सूरज
[16:42] ढलने के पहले ही निपटा चूके थे। घरों के दरवाजे आज बंद थे।
[16:48] खिड़कियों के अंदर दीप अब जल रहे थे।
[16:51] हर कुछ मिनट बाद बाद। तू तू से शंख और उलू की ध्वनि कौन
[16:57] जुटती? ये याद दिलाने के लिए कि आज रात
[17:00] कोई भी वो घर के पास ना जाए और को भी अपने कमरे में अकेले बैठे ये
[17:08] सब आवाजें सुन रहा था? चिंता के मारे वो सिगरेट पर
[17:13] सिगरेट पीता जा रहा था, पसीने से लतबत हो चुका था वो ये सोच कर कि
[17:19] आज उसके साथ क्या होने वाला था, क्या आज ही उसके जीवन की आखिरी
[17:26] रात थी? वो जब भी ये सोचता उसका डर से?
[17:30] खून जम जाता। उसने उठकर अपने कंपनी का दरवाजा
[17:35] लॉक किया, पत्ती बंद की और सोने की कोशिश करने लगा।
[17:41] दूर से आ रही शंक की आवाज उसके डर को बढ़ाती जा रही थी और वो बेचैनी
[17:47] से छटपटा रहा था। पर समय जैसे जैसे बीतता गया, शंख
[17:54] की आवाज धीरे धीरे कम हुई। गांव में भयानक खामोशी छाने लगी।
[18:00] शायद सब थक हार कर एक एक करके सोने चले गए थे और औरकों की भी
[18:05] ऐसी ही आग लग गई। और को एक झटके से उठा सुबह हो
[18:18] चुकी थी दूर कहीं से दर्दनाक चीख पुकार और लोगों के चिल्लाने की
[18:23] आवाज आ रही थी और ये आवाज सुनकर। उसका शरीर ठंडा पड़ गया क्योंकि
[18:29] वो समझ चुका था कि आज एक और आदमी की लाश फिर पोखर के पास मिली है।
[18:37] उसने किसी तरह चप्पल पहनी और वो पोखर की तरफ दौड़ा तो वो भाग रहे
[18:42] थे। औरतें रो रही थी।
[18:45] हवा में फिर से डर का माहौल था और को वो घर के पास आकर रुक गया।
[18:53] आज फिर बहुत से गांव वाले लाश को घेरकर खड़े थे और को भीड़ को
[18:59] चीखता हुआ आगे बढ़ा। सामने जमीन पर एक।
[19:04] लाश पड़ी थी जिसका सर गायब था। कटे हुए सर की जगह मांस के कुछ
[19:11] लोथड़े लटक रहे थे। कपड़े खून और कीचड़ से रंगे हुए
[19:16] थे। उस लाश के पैरों और जांघों पर
[19:20] गहरे गहरे निशान थे। जैसे किसी ने अपनी उंगलियों से
[19:24] बहुत ज़ोर उन्हें तालाब के नीचे की तरफ घसीटा हो, खींचा हो उन्हें
[19:30] पर तभी औरकों को कुछ ऐसा दिखा जिससे देख उसके पैर के नीचे की
[19:36] जमीन हिल गई। लाश के बाएं हाथ में एक अंगूठी
[19:41] थी। एक सोने की अंगूठी जिससे और को
[19:45] पहचानता था उस जमीन पर घुटनों के बल बैठ गया और अंगूठी पर लगे
[19:50] कीचड़ को हटाने लगा और और कीचड़ हटते ही वो जमीन पर गिर पड़ा और
[19:57] उसके गले से एक एक छीक निकली। मेरे भाई।
[20:05] वो लाश बादल की थी। अपने दोस्त को इस वक्त हालत में
[20:12] देख और को हिल गया था वो वो ज़ोर ज़ोर से रोने लगा किसी ने उसके
[20:19] कंधे पर। तब हाथ रखा और एक गांववाले ने
[20:23] धीरे से कहा। और को बापू संभालो अपने आप को, ये
[20:29] ये तो होना ही था। प्रतिमा हर उस्मट से बदला लेती
[20:33] है। जो जो औरतों के साथ जुर्म करता है
[20:37] वो न्याय दिलाती है अपने तरीके से।
[20:40] तुम तो बादल के दोस्त हो, तुम्हें तो पता ही है कि बादल अपनी बीवी
[20:45] को पीटता था, शायद शायद इसीलिए साक्ष्य ने उसे भी अपना शिकार बना
[20:51] लिया। पर पर बादल को तो कोई संकेत नहीं
[20:56] मिला था फिर। फिर बिना कोई संकेत के ये ये कैसे
[21:02] हो सकता है? संकेत मिला नहीं या उसने किसी को
[21:06] कुछ बताया नहीं। देखो मास्टर जी, हम उसे बचपन से
[21:10] जानते हैं। बादल बहुत सी बातों को दबाकर रखा
[21:14] था। जैसा उसने अपनी बीवी वाली बात भी
[21:17] तो छुपाई थी, वो तो हमें उसके बीवी के भाई से पता चली।
[21:22] शायद शायद उससे संकेत मिला भी हो और और उसने वो वाली बात भी दबाकर
[21:27] रखी हो। क्या पता वो भी तो एक शिक्षक ही
[21:31] था ना आप सब पढ़े लिखे लोग। कोई संकेत मिलने पर थोड़े ही ना
[21:35] हम गांव वालों को आकर बताओगे, बताओ मैं ठीक कह रही हूँ कि नहीं?
[21:41] भीड़ में खड़ी उस मौसी ने कहा जो औरकों को पिछली मौत के समय भी
[21:46] मिली थी और को कुछ नहीं बोला, बस रोता रहा।
[21:51] आखिरकार उस औरत ने कुछ गलत तो नहीं कहा था।
[21:54] उसने गांव में आने के पहले हफ्ते में ही खुद वो आवाजें सुनी थी पर
[22:00] आज तक कभी किसी को इस बारे में नहीं बताया, ना बादल को, ना किसी
[22:05] और को। उसे उसे बस दुख था कि बादल?
[22:09] उसे भी कुछ नहीं बता पाया। वो अपने इकलौते दोस्त को खोकर
[22:14] बिल्कुल टूट चुका था। थोड़ी देर में पुलिस आई दारोगा
[22:19] बाबू ने अपनी रूटीन इन्वेस्टिगेशन की नाम के लिए थोड़ी बहुत पूछ्ताछ
[22:24] भी की गई। फिर लाश को पुलिसवाले अपने साथ ले
[22:27] गए। और फिर धीरे धीरे सब लोग अपने
[22:31] अपने घर लौट गए, बादल के मौत के बाद से और को बदल गया, उसके चेहरे
[22:39] पर हमेशा उदासी रहती और आँखों के नीचे कालिख मानो उसने सोना बंद कर
[22:46] दिया हो। वो क्लास में पढ़ाता जरूर था पर
[22:50] हर वक्त उसके दिमाग में सिर्फ डर बैठा रहता।
[22:53] फ़ोन पुकुर दिखी का डर, उस उस शक चुन्नी का डर और बादल की मौत के
[23:00] एक हफ्ते बाद उसने फैसला किया कि वो ऐसे डर के साथ नहीं जी सकता।
[23:06] उसका। ना काम में मन लग रहा था ना वो
[23:09] ठीक से सो पा रहा था। सोर्स ने पोन पुकुर देखी और वो
[23:13] नौकरी दोनों हमेशा के लिए छोड़ने का फैसला किया।
[23:17] पर कहते हैं ना नियति में जो लिखा होता है होता आखिरकार वही है और
[23:24] औरकों के साथ भी वही हुआ। रविवार को अपना सामान समेट कर
[23:31] निकलने से पहले वो सीढ़ियों से फिसला और उसका पैर टूट गया।
[23:38] 19। सिक्सटीस का समय था डॉक्टर,
[23:41] फर्स्ट एयठ ये सब सहूलियत गांव में नहीं थी तब और वो वहीं फंस
[23:46] गया। गांव के वैद्य ने मरहम पट्टी तो
[23:50] की पर उससे ज्यादा कुछ फायदा नहीं हुआ और उसे एक महीने आराम करने को
[23:56] कहा गया और को बिना बैसाखी के अपने कमरे से भी बाहर नहीं निकल
[24:01] पा रहा था। ना वो क्लास कर पा रहा था, ना
[24:05] कहीं जाकर किसी से बात कर पा रहा था।
[24:08] उसका इकलौता दोस्त तो वैसे ही मर चुका था और इस कमरे में अकेले कैद
[24:13] हो औरकों का मानसिक संतुलन दिन ब दिन करने लगा।
[24:18] कोई भी आवाज सुन वो चौक उठता। रात होते ही अकेले डर से रोता
[24:24] रहता, बस सिगरेट पीता रहता और बैसाखी के सहारे लंगड़ लंगड़ कर
[24:30] रूम के चक्कर काटता रहता। वो डर से पागल हो रहा था और गांव
[24:35] वाले ये सब चुपचाप देख रहे थे। ऐसे ही दिन गुजरते गए।
[24:41] और फिर जल्द ही अगली अमावस्या पास आने लगी।
[24:46] गांव का माहौल फिर से डरावना होने लगा।
[24:50] फिर हर रात शंख की आवाज सुनाई देती।
[24:53] हर कोई अपने घर अँधेरा होने से पहले लौट जाता।
[24:56] हवा में फिर से वहीं खौफ का माहौल था पर और को।
[25:00] और को अब तक डर से अधमरा हो चुका था।
[25:04] वो वहीं फंसा रहा और देखते ही देखते अगली अमावस्या की रात भी आ
[25:11] गई। गांव का अंधेरा आज पहले से भी
[25:17] भारी था लोग। अपने अपने घरों में बन शंख बजा
[25:22] रहे थे पर जैसे जैसे रात बीतती गई आवाजें धीमी होती गई।
[25:29] अब पर की आवाज आ रही थी और हवा की और ऐसे ही पूरा गांव और और को
[25:36] नींद की आगोश में चले गए। मानो कोई नशा हवा में खोल दिया
[25:42] गया हो। रात के करीब 1:30 बजे हवा में एक
[25:46] हल्की सी आवाज गूंजी और को उठा बैसाखी उठाए।
[25:57] और फिर लंगड़ते हुए उस आवाज के पीछे पीछे पोखर की तरफ जाने लगा।
[26:04] ऐसा लग रहा था मानो वो होश में नहीं था मानो वो किसी के वश में
[26:12] था। पूरे गांव में सन्नाटा था, मानो
[26:17] सारे गांव वाले बेओच पड़े थे और को चुपचाप गलियों से होता हुआ
[26:24] धीरे धीरे अब बोनपुकुर डिग्गी के घाट पर बनी सीढ़ियों पर पहुंचा और
[26:29] को यहाँ आओ। पानी में आओ ना और बोन पोकर डिघी
[26:41] का पानी आज बिल्कुल शाम था और और को अब उस पोखर के पानी की ओर बढ़ा
[26:47] और फिर बैसाखी के सहारे पोखर में उतरने लगा।
[26:52] पर तभी उसका संतुलन बिखरा। वो पोखर के पानी में गिर पड़ा और
[26:58] अब लेही पल पानी शरीर पर चढ़ते ही वो होश में आ गया।
[27:03] मानो अब तक वो किसी तरह की गहरी नींद में था।
[27:08] उसने आसपास नजर दौड़ाई और वो डर से सहम उठा।
[27:13] क्योंकि वह अमावस्या की इस काली रात में पून पुकोदगी के पानी में
[27:19] खड़ा था। उसकी सांस तेज हो गई थी।
[27:24] उसने बस किसी तरह खुद को संभालना और पानी से बाहर निकलने के लिए
[27:28] मुड़ा ही था की तभी उसे। एक आवाज़ सुनाई दी और को कहाँ जा
[27:36] रहे हो? वो आवाज़ ठीक उसके पीछे से आई थी।
[27:43] वो घर के पीठ से और को डर से वहीं जम गया।
[27:49] वो काँपते काँपते पीछे मुड़ा। पहले तो उसे कुछ नहीं दिखा।
[27:54] पसंदीदा और पोखर का काला पानी जीस पर धूम छाई हुई थी पर फिर धीरे
[28:01] धीरे सरकती धूम के बीच खुद से थोड़ी ही दूर उसे एक औरत दिखाई दी
[28:09] जो उसकी तरफ। पीठ किए खड़ी थी।
[28:13] उसके आसपास मक्खियों काट एक झुंड मंडरा रहा था।
[28:18] उसके लंबे किले, खुले हुए बाल उसके पीठ पर बिखरे हुए थे।
[28:23] औरत कमर तक पानी के अंदर थी और औरकों को उसका चेहरा नहीं दिख रहा
[28:30] था। बस वो अपना एक हाथ पानी के सतह पर
[28:35] फेर रही थी और उसके उस हाथों की चूड़ियों से निकलकी सी चन चन की
[28:41] आवाज आ रही थी। कोने कोने बा?
[28:46] और कोने काप की आवाज में पूछा कोने।
[28:55] उसकी विपत से हँसी से पूरा तालाब गूंज उठा और वो हँसी सुन और को के
[29:02] हाथ पैर ठंडे पड़ गए। तभी हवा का एक झोंका आया।
[29:08] और उसके साथ एक दुर्गन्ध हवा में फैल गई।
[29:11] अजीब सी पतको चमेली के फूल और सड़े हुए मांस की दोनों साथ में
[29:17] जाती पो धुंध सरकने लगी। रोरको को वो औरत अब साफ़ नज़र आने
[29:25] लगी। उसने ध्यान से उस औरत को देखा और
[29:29] उसने जो देखा उसकी सास वहीं रुक गई।
[29:32] उस औरत के हाथ काले नीले रंग के थे, फूले हुए जैसे जैसे किसी बहुत
[29:39] दिन से पानी में सड़ रही लाश के होते हैं, जगह जगह से त्वचा फटी
[29:44] हुई थी। और उसके नाखून, उसके नाखून, जानवर
[29:49] जैसे लंबे थे, मुड़े हुए। कौन हो तुम और और यहाँ पान यहाँ
[29:55] पानी में क्या कर रही हो? और को भी।
[29:57] फिर कांपती आवाज में पूछा वो वो इस दुर्गन्ध से उस औरत से दूर
[30:03] भागना चाहता था। पर उसका सवाल सुन वो औरत चुप रही
[30:07] पर धीरे धीरे उसकी तरफ मुड़ी और औरकों ने जो देखा वो डर से चीख
[30:14] पड़ा। उस औरत की लाल साड़ी कीचड़ से
[30:20] लगभग थी। बाल बिखरे हुए थे जिसमे पोखर की
[30:24] गंदगी अटकी हुई थी। उसके सर के आसपास मक्खियाँ मंडरा
[30:29] रही थी। सोरत का चेहरा एक दम विभाज्य था।
[30:34] उसके हाथ की ही तरह काला, नीला और बहुत ज्यादा फूला हुआ।
[30:40] उसकी आँखें एकदम सफेद थी और उसके होंठ कटे फटे वो को देख अपना मुँह
[30:47] पूरा खोलकर एक डरावनी आवाज निकाल रही थी और उस आवाज को सुन और को
[30:54] का शरीर सुन बढ़ चुका था तभी और को की नजर।
[31:00] उसके दूसरे हाथ पर पड़ी और वो वो और ज्यादा सहम उठा क्योंकि उसके
[31:06] दूसरे हाथ से एक कट्टा हुआ, सिर लटक रहा था, एक फूला हुआ सिर
[31:13] जिसकी आँखें और मुँह अब भी खुले थे पर ये मक्खियां मंडरा रही थी।
[31:20] कुशाक चुनी ने अब उस सर को पानी से बाहर निकाला और पोली।
[31:26] पहचानना है ना तू देख इसे ध्यान से देख।
[31:35] और ये बोल उसने वो सिर उछालकर और को की तरफ फेंक दिया।
[31:40] को डर से चिल्ला उठा। वो बादल का कटा हुआ सर था।
[31:48] घूस के कटे हुए सर के मुँह से कुछ कीड़े रेंगते हुए बाहर आ रहे थे
[31:53] और ये देख और को पानी में फिर से गिर पड़ा।
[32:00] क्या हुआ अपने? दोस्त को देख।
[32:04] खुश नहीं है। तू जानती हूँ तुझे तुझे?
[32:12] उसकी बहुत। याद आ रही है आजकल जाएगा उसके पास
[32:17] बोल जाएगा। नहीं।
[32:23] मुझे मुझे जाने दो, मुझे जाने दो प्लीज़ मैं मैंने तुम्हारा कुछ
[32:29] नहीं बिगाड़ा प्रतिमा मैं मैंने तो तुम्हारा कभी कुछ नहीं
[32:33] बिगाड़ा, फिर तुम तुम मुझे यहाँ क्यों लाई हो?
[32:36] और को रोते हुए बोला वो शक चुन्नी अब दोबारा हंसने लगे।
[32:45] थे। मेरी बात पर यकीन नहीं था ना कहर
[32:52] की ये सब कहानियों थीं इसीलिए। इसीलिए आज तू यहाँ है देख मुझे
[33:01] मैं प्रोतिमा हूँ, प्रोतिमा हूँ, मैं तेरे जैसे ही एक पढ़े लिखे
[33:08] आदमी ने मुझे धुका दिया और उसकी गलती की वजह से ये गाने सुनने
[33:14] पड़े। मुझे अपनी जान देनी पड़ी पर तुम
[33:19] लोग तुम लोग फिर भी चुप नहीं रहे मेरे दुःख को पल हसे मेरा मज़ाक
[33:26] बनाया अब मैं हाँ, मैं एक एक करके तुम्हारा भी वही हाल करूँगी।
[33:35] जो तुम मर्दों की वजह से मेरा हुआ।
[33:40] सब मुझे मुझे माफ़ कर दो, प्रतिमा माफ़ कर दो मुझे मुझसे मुझसे गलती
[33:47] हो गई, फिर कभी नहीं होगी, फिर सच में कभी नहीं होगी, जाने दो मुझे
[33:52] प्लीज़ जाने दो। पर प्रतिमा को औरको की बातों से
[33:57] कोई फर्क नहीं पड़ा। वो अब उसके पास आने लगी।
[34:02] औरको भागने के लिए जैसे ही पीछे मुड़ा उसे अपने दोनों पैर पर एक
[34:08] जोरदार दर्द का एहसास हुआ। उसने माची देखा।
[34:13] तालाब के अंदर से बड़े बड़े नाखूनों से लहस कई हाथ उसके पैरों
[34:20] को पकड़कर नीचे खींच रहे थे और वो जितना हिलने की कोशिश करता वो हाथ
[34:27] और उसके नाखून उसके पैरों में धंस जाते।
[34:30] उन्होंने उसकी टांगों को। उसकी जांघों को पकड़ लिया था।
[34:34] उनके पंजे गहरे बजने लगे थे। उसके मास में उनकी चर में फैलने
[34:39] लगा था और को ने खुद को छुड़ाने की कोशिश की।
[34:43] पर जितना वो लड़ता उतने गहरे वो पंजे धसते जाते उसकी टांगों का
[34:49] मांस फाड़ रहे थे वो हाथ। और वो दर्द और सहनीय था, उसकी
[34:54] आवाज़ गूंज सहते रहा पर उन हाथों ने उसके पैर नहीं छोड़े और देखते
[35:00] ही देखते प्रतिमा भी उसके बिलकुल सामने खड़ी दिया।
[35:05] उसका कड़ा सा सड़ा हुआ काला चेहरा सफेद आँखे देख और वो डरावनी आवाज
[35:10] सुन। और को मछली की तरह चटपटाने लगा
[35:15] शचुरी ने धीरे से अपने खीले हाथ ऊपर उठाए और औरको के सर को अपने
[35:21] हाथों से पकड़ा। उसकी पकड़ असंभव रूप से मजबूत थी
[35:27] वो उसके सर को। दर्द के दूसरी दिशा में खींचने
[35:32] लगी। समय आ गया है तेरा अपने अपने
[35:39] दोस्त के पास जाने का। दर्द से और को झटपटाने लगा उसकी
[35:46] आँखों के सामने अँधेरा जाने लगा। नीचे से वो असं की हाथ उसे पानी
[35:51] के नीचे खींच रही थी और वो शाक्षु ने वो उसके सर को ऊपर खींच रही थी
[35:58] उसका चेहरा औरको के चेहरे से अब बस कुछ इंच दूध।
[36:04] सड़क और चमेली की वो औरकों के फेफड़ों में भर चुकी थी।
[36:09] वो दर्द से करा रहा था और फिर फिर एक झटके से वो शाख चुन्नी ने
[36:16] औरकों का सर ठंड से खींच कर अलग कर दिया और औरकों की दर्द ना चीख।
[36:22] पूरे बोनपुकुरतगी में गूंज उठी। उन हाथों ने औरकों का शरीर किनारे
[36:35] की तरफ धकेल दिया और प्रतिमा प्रतिमा उसका कटा हुआ सिर अपने
[36:41] साथ बोनपुकुरतगी में लेकर समा गई। सुबह जब लोग बाहर निकले तो पोखर
[36:56] के किनारे भीड़ लगी थी। आज फिर एक लाश थी वो घर के पास
[37:01] बिना सड़के पैरों पर वहीं गहरे निशान और पास ही एक पैसा की पड़ी
[37:07] थी जिसे देख। सब समझ चूके थे कि इस बार और को
[37:12] बाबू का नंबर आया था। गांव के लोग चुप थे।
[37:16] उस मौसी ने बस्तीरे से कहा। कहा था मैंने और को बाबू से रोटी
[37:22] माँ की बात पर आप अविश्वास मत कीजिये।
[37:26] हाँ पाब इस गांव का हिस्सा हैं। उसे उसे अगर आपके अविश्वास करने
[37:34] की बात का बुरा लग गया तो कही तो कही वो आपको पानी में न भुला ले।
[37:40] भरोर को बाबू ने कभी इन बातों पर विश्वास किया ही नहीं।
[37:45] आप आप खुद ही देख लो तुम सब। का क्या हाल हुआ है आज?
[37:53] आज बोनपुर गांव एक खंडहर में बदल चुका है।
[37:57] आधे परिवार खत्म हो गए हैं, आधे लोग गांव छोड़कर चले गए हैं।
[38:02] बस अगर कोई वहाँ रह गया है तो वो है प्रतिमा।
[38:09] आप ही अगर कभी बोनपुकुर गांव जाए तो उस वो घर के पास मत जाइएगा।
[38:15] अमावस्या के दिन तो बिल्कुल नहीं, क्या पता आपको भी कोई आवाज सुनाई
[38:21] दे और इसी के साथ ये कहानी यहीं खत्म होती है।
[38:31] अगर आपको मेरी ये कहानी अच्छी लगी है तो मुझे इंस्टाग्राम पर डीएम
[38:35] करके जरूर बताएं। ऐट स्पोक कास्ट ओरिजिनल्स चलिए अब
[38:40] जल्दी से बढ़ते हैं। आज के शूटआउट सेशन की तरफ इस
[38:44] हफ्ते का पहला शूटआउट जाता है गांधीनगर गुजरात से जीत वंजारा
[38:49] को। जिन्होंने हमें इंस्टाग्राम पर
[38:51] कॅाटाक्ट किया ही है। बीन लिसनिंग टु स्पोकर्स फॉर सम
[38:55] टाइम नाउ एंड वो अपनी छोटी सी बेटी के साथ मेरी कहानियों कार
[38:59] ड्राइव करते हुए सुनते हैं। उन्होंने हमारे साथ एक घटना भी
[39:04] शेयर की है जो आप बहुत जल्द आपबीती में सुनने वाले हैं।
[39:07] हे जीत थैंक यू फॉर रीचिंग। आप अपनी बेटी वयाना को मेरी तरफ
[39:12] से हाई जरूर बोलिएगा हाई वयाना एंड थैंक यू फॉर युअर स्वीट मैसेज
[39:16] आई ऍम सो ग्लैड यू अरे पार्ट ऑफ़ थिस ग्रोइंग कम्यूनिटी इस हफ्ते
[39:20] का दूसरा शाट हो जाता है बैंगलोर से मोहम्मद तबरेज़ को जिन्होंने
[39:25] हमें इंस्टाग्राम पर कॅाटाक्ट किया।
[39:28] लव्स बोर्ड्स बुक कास्ट एंड फार ऑफ फ्राइडेज और उन्होंने रिसेंटली
[39:32] हमें सुनना शुरू किया एंड एवेरी टाइम आई अपलोड ए स्टोरी ही मैसेजस
[39:37] मी टेलिंग मी हाउ ही फाउंड इट एंड आइवी बोथ जस्ट लव दट हे मोहम्मद
[39:42] थैंक यू फॉर रीचिंग आउट एंड फॉर लाइकिंग आवर कंटेंट सो मच।
[39:46] सो ग्लैड दट यू रीचड आउट एंड रेगुलर फीडबैक के लिए थैंक्स ए
[39:50] लॉट एंड फाइनली आज का फाइनल शॉट ऑफ जाता है।
[39:53] श्वेता काल शेट्टी को इन्होंने भी हमें इंस्टाग्राम पर कॅाटाक्ट
[39:57] किया एंड इन्हें मेरी कहानियों काफी डरावनी लगती है।
[40:00] हे श्वेता थैंक यू सो मच फॉर रीचिंग उस।
[40:04] कीप सपोर्टिंग एंड लिसनिंग टु उस लाइक यू ऑलरेडी डू एंड विथ थिस।
[40:08] आज का एपिसोड यही खत्म होता है। अगले हफ्ते हम लौटेंगे एक आप बीती
[40:14] के एपिसोड के साथ फारू फ्राइडेज पर हैलोइंग स्पेशल शार्ट सीरीज चल
[40:19] रहा है। उसका भी एपिसोड आ चुका है।
[40:22] डोन्ट मेस इट ओके? डीटेल्स डिस्क्रिप्षन में हैं सो
[40:25] अगले हफ्ते फिर मिलेंगे मैं हूँ मंजिला और आप सुन रहे हैं इस
[40:30] फोरकास्ट अवि और मंजिला के साथ सुनते।
[40:35] रहिए स्पोक कास्ट अवि और मंजिला के साथ।

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