# Ep30 - 5 ORIGINAL Horror Stories - Best of 2024 | SpookCast | Horror Story | Hindi Horror Podcast | Bhoot | Horror Kahaniya |

An episode of [SPOOKCAST - A Hindi Horror Podcast](https://invisiblenetwork.ai/podcast/1767172215), 20 Dec 2024, 1 h 34 min.

Audio: https://anchor.fm/s/f51bcf74/podcast/play/96090140/https%3A%2F%2Fd3ctxlq1ktw2nl.cloudfront.net%2Fstaging%2F2024-11-20%2F391882935-44100-2-4679c2b3a8d61.m4a

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## Transcript

[0:01] नमस्ते दोस्तों और आपका स्वागत है।
[0:03] स्पोक कास्ट के इस खास एपिसोड में 2024 खत्म होने को आया है और आज
[0:08] के इस एपिसोड में हम लेके आए हैं बेस्ट ऑफ़ स्पोक कास्ट उन
[0:13] स्टोरीज़ का कम्पैलेशन जो आपके दिल के करीब है और बस इतना ही
[0:17] नहीं। अगले एपिसोड में हम एक क्रिसमस
[0:20] स्पेशल करने वाले हैं जिसमें हम शेयर करेंगे।
[0:23] आपकी भेजी गई कहानियों सो स्टे ट्यून्ड लेकिन दोस्तों एक और
[0:27] रिक्वेस्ट है हमने शुरू कर दिया है एक नया सफर ये है हमारा दूसरा
[0:33] पोडकास्ट चैनल स्पॉटिफाइ पे। जिसमे नए एपिसोड हर फ्राइडे रात
[0:38] 9:00 बजे आती रहेंगी। इन अडिशन टु स्पूकास्ट हमे वही
[0:43] प्यार और सपोर्ट चाहिए जो आपने हमे यहाँ स्पूकास्ट में दिया है
[0:48] तो इस बात की डबल धमाका फ्राइडेज को स्पूकास्ट और फारू फ्राइडेज
[0:54] अभी फॉलो करे हमे। और मिलते हैं इस नए सफर पे, तब तक
[0:58] के लिए सुनते रहिए स्पूककास्ट सुनते रहिए स्पूककास्ट, अवि और
[1:05] मंजिला के साथ हम इंसानों की एक बहुत बुरी आदत होती है।
[1:13] अगर कोई हमसे कुछ करने को मना करे तो हम उसी को करते है और कई बार
[1:18] इसका अंजाम बहुत भयानक होता है। नमस्कार दोस्तों, मेरा नाम अवि है
[1:25] और आज हम ऐसे ही तीन दोस्तों की कहानी सुनेंगे जिन्होंने कुछ ऐसा
[1:29] किया जिसे करने से पूरा शहर डरता था।
[1:32] भूतिया जंगल और पहाड़ों के बीच एक ऐसी जगह थी जहाँ एक समय लोग घूमने
[1:39] और पिकनिक करने जाते थे, पर रात में वहाँ जाना तब भी सेफ नहीं था।
[1:44] फिर भी बहुत से लोग रात में भी वहाँ नशा पानी करने जाते थे।
[1:49] मगर 1 दिन वहाँ से लोगों के गायब होने की खबर आने लगी।
[1:53] बहुत से लोग जो रात में वहाँ गए थे वो कभी नहीं लौटे।
[1:57] अगले दिन वहाँ बस खून और मांस के टुकड़े मिले।
[2:01] ऐसी अफवाह फैल गई कि तेकड़ी में कुछ है।
[2:06] कुछ लोग कहने लगे कि वहाँ कोई जंगली जानवर रात में शिकार कर
[2:10] लोगों को मार रहा है। पर फॉरेस्ट ऑफिसर्स को इसका कोई
[2:14] प्रमाण नहीं मिला। जो लोग वहाँ से जैसे तैसे बचकर आए
[2:18] वो सब एक काले साए के बारे में बात करते।
[2:22] एक औरत का साया जो लोगों का शिकार कर रही थी।
[2:26] बुजुर्गों का कहना था वो काला साया एक चुलैल का था, जिसे बरसों
[2:31] पहले लोगों ने पूजा पाठ करके जंगल में किसी पेड़ में कैद कर दिया था
[2:37] पर वो किसी तरह लौट आई थी। वो अब भूखी थी और लोगों का शिकार
[2:42] कर उन्हें खा रही थी। रोहित, अमय और प्रणव बहुत दिनों
[2:47] से मिलने की सोच रहे थे। महीनों से हॉस्टल के दिनों की तरह
[2:51] मिल के कुछ पार्टी करने का प्लान था पर प्लान बन नहीं रहा था।
[2:55] तीनों की शादी भी हो चुकी थी। रेस्पोंसिबिलिटीस की वजह से अब
[2:59] मिलना नहीं हो पाता। इसी वजह से परफेक्ट जगह ढूंढ़ते
[3:03] हुए। तीन महीने बीत चूके थे पर प्लान
[3:06] नहीं बन रहा था। हैलो प्रणब सुन ना मेरे दिमाग में
[3:11] एक धासु प्लान आया इस होली वाले वीकेंड पे चल भूतिया डिग्री पे
[3:16] बैठते है कोई डिस्टर्ब नहीं करेगा पास में एक रूम भी बुक कर लेंगे,
[3:20] ज्यादा चढ़ गयी तो सोने चले जायेंगे।
[3:23] तू पागल है क्या? रोहित उस जगह पर कोई नहीं जाता।
[3:26] तुझे पता है फिर ऐसे बकवास प्लान क्यों बना रहा है?
[3:30] फिर से तेरा प्लान फ्लॉप हो जायेगा।
[3:32] अरे यार भूत चुड़ैल, ये कुछ नहीं होता यार।
[3:37] वो तो ऐसे ही बात फैला के रख दी लोगों ने ताकि वहाँ हमारे जैसे
[3:41] लोग दारू पीने न जाए रात में नहीं, नहीं, नहीं मुझे वहाँ नहीं
[3:46] जाना। मैंने काफी बुरी बातें सुन रखी
[3:48] है। वहाँ के बारे में कितने लोग कहते
[3:51] हैं वहाँ एक जोडैल रहती है सब पागल थोड़ी ना है रोहित।
[3:55] उन तीनो में प्रणव सबसे ज्यादा डर होगा।
[3:58] रोहित और हमय को ऐसे एड्वेंचर बहुत पसंद थे।
[4:03] अरे अच्छा सुन एक काम करते है हम वहाँ 5:00 बजे जाएंगे तब रौशनी भी
[4:07] होगी। अगर ठीक नहीं लगा तो फिर रूम में
[4:09] आ जाएंगे वहाँ पी लेंगे हाँ, बस तब एक ही प्रॉब्लम होगी।
[4:13] रूम में खिड़की दरवाजा बंद करके सिगरेट नहीं।
[4:16] अमन को अस्थमा अटैक में आ जाये, रोहित को पता था ये सुनने के बाद
[4:20] प्रणब रूम में नहीं पीने बैठेगा, अब ही हुआ अमन से तो रोहित ने
[4:24] पहले ही बात कर सब ठीक कर के रखा था।
[4:27] शनिवार दोपहर उन तीनो ने होटल में चेक इन किया।
[4:30] फिर शाम को रोहित के कार्ड में बैठ भूतिया टेकड़ी पहुंचे।
[4:34] इस सुनसान तेकड़ी पर बस लंबे लंबे पेड़ थे और पहाड़ के ऊपर एक
[4:38] पुराना सा मंदिर। प्रणब के मुँह पर उस जगह का डर
[4:42] साफ दिख रहा था और रोहित उसको और डरा कर मज़े ले रहा था।
[4:46] अमयको की इस जगह पर अनजी लग रहा था।
[4:49] इतने पेड़ थे, चारो तरफ शान ढल चुकी थी पर कोई पक्षियों की आवाज़
[4:53] नहीं थी। अजीब सा सन्नाटा था बस रोहित की
[4:57] आवाज़ चार तरंग गों जलाई थी। यहाँ एक पुराना मंदिर भी है।
[5:01] अगर तेरी चुड़ैल आ भी गई तो हम मंदिर में चले जायेंगे।
[5:05] तू क्यों फालतू में डरा है? अब चल पार्टी शो करते हैं।
[5:09] तीन महीने से पॉटल्स हमारा इंतजार कर रही है।
[5:13] वो तीनों टेकड़ी के ऊपर की तरफ़ चले गए और मंदिर से कुछ दूर एक
[5:17] चादर बिछा के जमीन पर बैठ गए। चारों तरफ़ सूखे पत्ते और खाली
[5:22] पॉटल्स पड़ी हुई थी। हॉस्टल की कहानियों, पुराने दिन
[5:26] की बातें हँसी मजाक करते करते तीन 4 घंटे बीत गए, तीनों को चढ़ चुकी
[5:31] थी। रोहित ने अपना फ़ोन निकाला और उन
[5:35] तीनों का फेवरेट गाना फ़ोन पर प्ले कर दिया।
[5:38] वो तीनों नशे में झूमते हुए साथ साथ गाना गुनगुना रहे थे।
[5:42] तभी प्रणव मस्ती के चक्कर में गिर पड़ा और ज़ोर से चिल्लाता।
[5:47] रोहित ने देखा कि प्रणव के हाथ में एक कांच का टुकड़ा सीधा अंदर
[5:51] घुस गया है। इससे उसका काफी खून बहने लगा।
[5:55] ये देख के तीनों टेंशन में आ गए। उनके पास वह स्टेट का कोई सामान
[5:59] नहीं था। प्रणब अपने रुमाल से खून को रोकने
[6:02] की कोशिश कर रहा था। तभी अचानक मंदिर के पास वाले
[6:07] थपेड़ों के पास से एक सरसराहट की आवाज आई।
[6:12] ऐसा लगा मानो कोई एक पेड़ से दूसरे पेड़ के पीछे भाग कर गया
[6:16] हो। और तीनों एकदम सजा खोकर बैठ गए।
[6:21] तीनों मंदिर के पास वाले थपेड़ों की तरफ़ देखने लगे पर वह कुछ नहीं
[6:25] दिखा। रोहित ने मंदिर की तरफ़ टॉर्च की
[6:28] लाइट भी मारी पर कुछ नहीं था। वो उस तरफ देख ही रहे थे कि उनके
[6:34] बाएं तरफ के पेड़ के पीछे से भी वही आवाज़ आई।
[6:37] कोई भाग कर एक पेड़ से दूसरे पेड़ के पीछे चला गया था।
[6:41] बस इस बार पेड़ दूर ने उनसे बस 1012 हाथ की दूरी पर ही था।
[6:49] अब एक और आवाज़ आने लगी। ऐसा लग रहा था कि कोई ज़ोर ज़ोर
[6:55] से हवा में कुछ। सूंघ रहा हूँ।
[6:59] तीनों चुप थे, पार्टी का मूड बदल चुका था और नशा भी उतर गया था।
[7:05] हँसी मजाक सब बंद तीनों बिल्कुल सतर्क होकर बैठे थे।
[7:09] खुद का होगा शायद यहाँ इतनी शांति है, शायद इसीलिए इतने ज़ोर से
[7:14] आवाज़ आ रही है। रोहित ने कहा, कुत्ता नहीं था ये
[7:19] ये किसी भारी चीज़ के दौड़ने की आवाज़ थी और ये दूसरी आवाज़ मुझे
[7:25] लगता है हमें यहाँ से चले जाना चाहिए।
[7:27] ऐसा कहकर प्रणब खड़ा हो गया हूँ। जो भी हो, कुत्ता हो या इंसान, यह
[7:33] ऐसा बैठना मुझे बिल्कुल ठीक नहीं लग रहा।
[7:35] और हमारे पास तो फर्स्ट ऐड भी नहीं है।
[7:38] प्रणब में ज्यादा खून बहने से पहले चल रूम में वापस चलते हैं।
[7:43] यह कहकर हमें भी खड़ा हो गया। जल्दी जल्दी अपना सामान समेट कर
[7:48] वो तीनों टेकरी से नीचे उतरे और गाड़ी के पास पहुंचे।
[7:52] वो तीनों काफी डरे हुए थे। उन्हें ऐसा लग रहा था कि गाड़ी के
[7:56] पास लौटते वक्त कोई उनका पीछा कर रहा था पर पीछे मुड़ने पर उन्हें
[8:00] कोई नहीं दिखा। वो तीनों गाड़ी अनलॉक करके अंदर
[8:04] बैठे ही थे कि तभी गाड़ी के छत पर एक थप सी आवाज आई।
[8:09] ऐसा लगा जैसे कुछ बड़ा और भारी। गाडी के छत पे गिरा हो।
[8:14] प्रणब का मुँह सफेद पड़ गया। तीनों ने हड़बड़ाकर गाडी के
[8:21] दरवाज़े लॉक कर दिए। गाडी के छत पर कोई अपने बड़े बड़े
[8:25] नाखूनों से आवाज कर रहा था मानो वो छत को चीरकर।
[8:31] गाडी में घुसना चाहता था एक अजीब सी घुरानी की आवाज आ रही थी गाडी
[8:38] भगा और निक्कल यहाँ से रोहित प्रणव ने कापते हुए कहा पर रोहित
[8:43] के हाथ कितने काप रहे थे की वो इग्निशन में अब तक चाबी ही नहीं
[8:46] डाल पाया था। तीनों उस अंधेरी रात में जंगल के
[8:50] अंदर गाड़ी में चुपचाप बैठे हुए थे।
[8:53] उन्हें ऐसा लग रहा था की वो शायद यहाँ से कभी नहीं निकल पाएंगे।
[8:58] प्रणब का रुमाल खून से गीला हो चुका था और मैं उसे अपना रुमाल दे
[9:02] ही रहा था की बड़े बड़े नाखून से भरा हुआ एक पंजा।
[9:07] विंडो के पार से एक नोचने लगा। वो हाथ इंसानों जैसा था पर मांस
[9:13] सड़ा और काला नाखून इतने बड़े की उससे किसी का खून भी किया जा सकता
[9:21] गाड़ी के ऊपर से उनको ढहाते हुए। गनव की तरफ की खिड़की खोलने की
[9:26] कोशिश कर रहा था। रेनव डर से बच्चों की तरह रोने
[9:30] लगा। रोहित के हाथ से चाभी जमीन पर गिर
[9:33] गई और वो झुक कर अंधेरे में हाथो से उसे ढूंढ रहा था।
[9:37] तभी गाड़ी के पीछे एक और झांसी आवाज आई।
[9:42] ऐसा लगा जैसे छत पर जो कुछ भी था वो गाड़ी से उतर गया हो और उसी
[9:48] वक्त रोहित को भी चाबी मिल गई और उसने इग्निशन ऑन किया।
[9:51] उसने गाड़ी के सामने लगे मिरर में एक बार देखा उसे अंधेरे में बस दो
[9:55] लाल जलती हुई बड़ी बड़ी आँखें देखीं।
[10:00] रोहित को ऐसा लगने लगा कि उसको हार्ट अटैक आने वाला है।
[10:03] वो तीनों जैसे तैसे वहाँ से निकले हैं पर अभी भी कोई तो था जो एक
[10:07] पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलांग लगाकर उनका पीछा कर रहा था।
[10:11] उसकी आवाज़ से उन तीनों के कान फट रहे थे।
[10:16] फिर जंगल का रास्ता जैसे ही खत्म हुआ उस आवाज़ को उन।
[10:20] तीनों ने पीछे छोड़ दिया पूरे रस्ते किसी ने कुछ नहीं कहा।
[10:28] होटल पहुँचकर तीनों भागते हुए रूम में घुसे और सारे खिड़की और
[10:33] दरवाजे लॉक करने लगे। धीरे धीरे तीनों शांत हुए।
[10:38] और मैंने प्रणब का फर्स्ट ऐड किया।
[10:41] फिर रोहित और प्रणब में काफी जोरदार झगड़ा होने लगा।
[10:45] प्रणब ने पहले ही कहा था सबसे केकड़ी पर कुछ है, सुन रोहित सब
[10:50] कुछ मजाक नहीं होता। हम तीनों ने देखा वहाँ कोई जानवर
[10:53] नहीं था। हम तीनों आज यहाँ कैसे बचकर आ पाए
[10:56] हैं ये हमें ही पता है। ऐसा कहकर प्रणब गुस्से से उठा और
[11:00] रूम के बाहर चला गया। सच कहें रोहित भी उस हादसे से हिल
[11:04] चुका था। जानवर हो या चुड़ैल कोई उनका पीछा
[11:08] कर रहा था। प्रणब के खून को चखना चाहता था वो
[11:12] इस बात में कोई दो राहे नहीं थी और वो लाल आँखें।
[11:16] उस बारे में उसने प्रणव और अमय से कुछ नहीं कहा।
[11:22] रोहित और अमय दोनों रूम में थे और बात करते करते दोनों की आँख लग
[11:26] गई। रात को रोहित की आँख खुली।
[11:29] उसको पानी पीना था, दो पच रहे थे, उसने देखा।
[11:34] कि अमय उसके साइड से गायब था। वो झट से उठा।
[11:37] उसने उठकर देखा तो वो रूम में अकेला था।
[11:40] रोहित ने सोचा प्रणव और अमय शायद सेटिंग एरिया में बैठे थे।
[11:44] सेटिंग एरिया से एक अजीब सी आवाज आ रही थी।
[11:47] वो उठकर धीरे धीरे उधर गया। यहाँ सिर्फ एक नाइट लैंप और टीवी
[11:53] ऑन था। सोफा खाली था।
[11:56] समय और प्रणब दोनों नहीं थे। वहाँ अंधेरे में वो रूम के चारो
[12:01] तरफ देखने लगा। वहाँ की खिड़की खुली हुई थी।
[12:04] उसे बहुत डर लगने लगा तभी उसे सोफा के उस तरफ जमीन पर कोई बड़ा
[12:10] हुआ दिखाई दिया। वो झट से उस तरफ गया।
[12:14] लेकिन उन पैरों के घुटनों से ऊपर कुछ भी नहीं था।
[12:19] शरीर कायत किसी ने मांस निकाल लिया था।
[12:23] शरीर से चारों तरफ खून और मांस के टुकड़े पड़े हुए थे।
[12:28] पास में ही हमें एक टपड़े भी पड़े थे।
[12:31] रोहित दर से पीछे हटने गया तो खून में फिसलकर जमीन पर गिर गया।
[12:36] उसकी नजर दीवार की तरफ गई। उसे प्रणब दिखा।
[12:40] दीवार के कोने में जमीन से आठ नौ फिट ऊपर प्रणब के सामने एक बहुत
[12:47] लंबी औरत खड़ी थी। उसने अपने एक हाथ से प्रणब को गले
[12:51] से पकड़कर हवा में लटकाकर रखा था। उसके बड़े बड़े नाखून प्रणब के
[12:55] गले में धंसे हुए थे। दूसरे हाथ के नाखून से वो प्रणब
[13:00] के शरीर में ठसाकर कुछ निकालकर खा रही थी शायद उसका मांस।
[13:08] रायटर से कांपने लगा। प्रणव भी शायद अमय की तरह मर चुका
[13:13] था। उसके शरीर पर कोई शर्ट नहीं थी।
[13:16] शरीर खून से लतपथ था, वो औरत प्रणव के मांस को बड़े चाव से चबा
[13:23] चबा के खा रही थी। जैसे कि वो बहुत दिनों से भूखी
[13:27] हो। अपने लंबे जीभ से प्रणव के शरीर
[13:31] पर रिस रहे खून को चाट रही थी वो अचानक उसने अपनी पूरी गर्दन पीछे
[13:37] मुड़कर रोहित की तरफ देखा, उसकी दो लाल जलती हुई।
[13:42] बड़ी बड़ी आँखें ठीक वैसी ही थीं जैसे रोहित ने गाड़ी के मेयर में
[13:48] देखा था। उसका मुँह उसके कानों से गले तक
[13:52] खुला हुआ था। उसके नुकीले दांतों से अमे के
[13:56] शरीर से निकला हुआ मांक लटक रहा था, उसके लंबे लंबे बिखरे हुए बाल
[14:01] खून में गीले होकर उसके मुँह पर चिपक गए थे।
[14:05] रोहित की तरफ देख कर बोली। जीतने महीनों से मैंने कुछ नहीं
[14:12] खाया। आज तुम तीनों टेकरी पर आए।
[14:18] अच्छा किया इसका खून तो मैंने वहीं बचत लिया था।
[14:25] अब मैं जी भर के तुम लोगों का मांस खाऊंगी क्या पता?
[14:33] फिर कितने दिनों के बाद कोई शिकार मिले?
[14:38] ऐसा क्या कर उसने अपना मुँह खोला? उसके खून से सने नुकीले दांत कान
[14:45] से गले तक खुल गए। फिर वो रोहित की तरफ एक छलांग
[14:51] लगाकर झपवी। अगले दिन जब शाम तक उन तीनों ने
[14:59] चेकआउट नहीं किया, ना दरवाजा खोला तब पटेल वालों ने रूम खोलकर देखा।
[15:04] पूरा रूम खून से लथपथता। दीवार, जमीन, पर्दे, बिस्तर ऐसी
[15:11] कोई जगह नहीं थी जहाँ खून नहीं था।
[15:15] जगह जगह पे मांस के टुकड़े पड़े हुए थे।
[15:17] पूरे रूम से आने वाली खून की गंध से सबका जी मचला रहा था।
[15:22] पर रोहित, अमय और प्रणब वो तीनों गायब हो चूके थे।
[15:29] बहुत यार टेकड़ी पर गायब हुए दोस्त के लोगों की तरह ठेली ठेली
[15:42] बहुत क्लोज़ राइनो। नमस्कार दोस्तों, आज हम आपके लिए
[15:59] एक वांटेड डॉल की कहानी लाये हैं जो अपनी अधूरी इच्छाएं को पूरा
[16:03] करने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार थी।
[16:12] शाम का समय था जोरों से बारिश हो रही थी।
[16:17] दरवाजे पर दस्तक सुन मानव ने दरवाजा खोला पर बाहर कोई नहीं था।
[16:23] दरवाजा बंद करने के लिए उसने जैसे ही हाथ बढ़ाया उसने देखा कि सामने
[16:28] जमीन पर। न्यूसपेपर में रैप किया हुआ एक
[16:31] बड़ा सा पार्सल पड़ा था। उसने न्यूसपेपर हटाकर देखा, अंदर
[16:36] एक गुड़िया थी। इस गुड़िया के बाल काले रंग के ऊन
[16:40] से बने थे और आँखों को बटन्स लगाकर बनाया गया था।
[16:44] वो गुड़िया काफी बड़ी थी। उसके मुँह पर लाल रंग के ऊन से
[16:47] होंठ बने थे। जीस पर एक अजीब सी हँसी थी मानो
[16:51] सहम उठा क्योंकि वो इस गुड़िया को पहचानना था ये उसके 11 साल की
[16:57] बेटी की दोस्त लीला की दौल थी। लीला अपनी सौतेली माँ और पापा के
[17:02] साथ उनके घर से 10 मिनट की दूरी पर रहती थी।
[17:06] रोज़ शाम इसी समय पर। वो मानव के घर अपनी इस डॉल के साथ
[17:09] आती और श्रुति के साथ खेलती। लीला तीन 4 घंटे खेलती फिर मानव
[17:14] उसे घर छोड़ा था। यही उनका रोज़ का रूटीन था पर
[17:18] पिछले एक हफ्ते से लीला खेलने नहीं आ रही थी।
[17:22] वो मिसिंग थी और 2 दिन पहले। जंगल के पास नाले में पुलिस को
[17:29] उसकी लाश बरामद हुई थी और उस लाश के पास ये गुड़िया मानव ने नीचे
[17:36] देखा। वो गुड़िया उसके हाथों में एक
[17:39] बेजान लाश की तरह पड़ी हुई थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि इस
[17:43] गुड़िया को उसके दरवाजे पर किसने छोड़ा?
[17:46] इस डॉल को तो पुलिस एविडेन्स कलेक्ट करते वक्त ले गई थी।
[17:50] उसने सोचा कि कल ऑफिस जाने से पहले पुलिस स्टेशन में उस डॉल को
[17:54] दे आऊंगा और बिना समय गंवाए उसने अपने पार्किंग के कार्नर में रखे
[17:58] एक स्टोरेज बॉक्स में उस गुड़िया को रख दिया।
[18:02] पापा लीला आए क्या नहीं बेटा? न्यूसपेपर वाले भैया पैसा लेने आए
[18:07] थे और लीला कैसे आएगी बेटा? वो तो अपने दादी के घर चली गई है
[18:12] ना, हमेशा के लिए मैंने तुम्हें पहले भी बताया था ना फिर?
[18:16] मानव और उसकी वाइफ शर्मिष्ठा ने श्रुति को लीला के मर्डर के बारे
[18:20] में कुछ नहीं बताया था। उसने दरवाजा बंद किया फिर अंदर
[18:24] जाकर। शर्मिष्ठा को पूरी बात बताई।
[18:27] दोनों काफी हैरान थे कि मर्डर सीन का एविडन्स उनके दरवाजे के बाहर
[18:31] कैसे आ पहुंचा? रात को खाना खाने के बाद मानो और
[18:36] शर्मिष्ठा टीवी देख रहे थे। ज्योति डाइनिंग टेबल के पास खेल
[18:40] रहे थे। अचानक मांडव ने नोटिस किया।
[18:43] की श्रुति के पास से फुसफुसाकर बात करने और हंसने की आवाज आ रही
[18:47] थी। वो झट से उठा और उसके पास गया
[18:52] जमीन पर डरी के ऊपर फैले खिलौनों के बीच श्रुति के सामने लीला की
[19:00] डौती। श्रुति उस डॉल के कान में कुछ कह
[19:02] रही थी और ज़ोर ज़ोर से हंस रही थी।
[19:05] मानव हैरान था पर उसे गुस्सा भी आ रहा था।
[19:08] श्रुति तुम्हें ये डॉल कहाँ मिले? पापा ये तो मेरे स्टडी टेबल के
[19:13] चेहरे पर रखी थी, मुझे लगा कि आपने और मम्मी ने रखी है।
[19:17] वैसे लीला अपने इस डॉल के बिना कहीं नहीं जाती थी।
[19:21] वो अपनी डॉल हमारे घर से दादी के घर क्यों चलेगी?
[19:23] पापा मानव को समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या जवाब दे?
[19:28] लीला शायद गलती से इसे छोड़कर गयी है।
[19:30] बेटा मैं कल ही इस डॉल को उसे करियर कर दूंगा, ये मुझे दे दो और
[19:35] तुम अब सोने चले जाओ। श्रुति खिलौने समेट कर अंदर चली
[19:39] गई। मानव को काफी अजीब लग रहा था।
[19:43] शाम से अजीबो गरीब घटनाएं घट रही थी।
[19:46] अगर बारिश नहीं होती तो वो इस गुड़िया को अभी पुलिस स्टेशन ले
[19:49] आता। लीला की मर्डर के बाद वो और
[19:52] शर्मिष्ठा काफी शौक में थे। वह दोनों लीला को बहुत प्यार करते
[19:56] थे। लीला की सौतेली माँ उसके साथ बहुत
[19:58] बुरा बर्ताव करती थी। इसलिए वो दोनों से श्रुति जैसे ही
[20:03] परिवार का हिस्सा समझते थे, उसकी इतनी दर्दनाक मौत नहीं।
[20:07] उसे और शर्मिष्ठा को काफी हिला दिया था।
[20:11] उस पर आज शाम से इस डॉल का बार बार इस तरह से सामने आना उसे और
[20:15] परेशान कर रहा था। जब मानव ने बैडरूम में आकर
[20:19] शर्मिष्ठा से इस बारे में बात की तब उसने मानव से कहा श्रुति छोड़
[20:23] दी है शायद वही डॉल पार्किंग से उठाकर अंदर लाई होगी पर अब डाँट
[20:27] के डर से झूठ बोल रही है। मानव ने इस बारे में और कुछ नहीं
[20:30] कहा और थोड़ी देर बाद वो सो गया। रात के 2:00 बजे अचानक शर्मिष्ठा
[20:40] की आंख खुली। चारों तरफ सन्नाटा था, बस एक
[20:43] हल्की सी आवाज आ रही थी। शर्मिष्ठा ने ध्यान से सुना, ऐसा
[20:48] लग रहा था कि कोई रो रहा है। वोट कर बिस्तर से उतरी।
[20:51] और रूम के बाहर निकली। उसने देखा कि श्रुति के रूम से
[20:55] रोने की आवाज आ रही है। उसने जैसे ही श्रुति के रूम का
[20:59] दरवाजा खोला उसने देखा कि श्रुति जमीन पर बैठी हुई थी और उसके
[21:03] सामने लीला की डोल थी शर्मिष्ठा के पैर वहीं जंग है श्रुति ये
[21:10] डोल। तुम इसे वापस अंदर क्यों लेकर आए?
[21:13] अगर पापा ने देख लिया तो पता है ना बहुत डांट पड़ेगी और ये रोने
[21:16] की आवाज कहाँ से आ रही थी, तुम रो तो नहीं रही थी ना?
[21:19] मम्मा मैंने इस डॉल को अंदर नहीं लाया, मैं सो रही थी, फिर अचानक
[21:24] से रोने की आवाज आने लगी तो मैंने उठकर देखा तो ये डॉल मेरे पेट पर
[21:28] मेरे पैरों के पास थी। और उसके अंदर से ना मम्मा एक आवाज
[21:33] आ रही थी रोने की। जा कुछ भी शुद्ध है तुमने सपना
[21:40] देखा होगा बेटा अब जाओ चलो सो कल स्कूल है ना और ये डॉल मुझे दे दो
[21:44] पापा ने अगर देख लिया ना तो बहुत डांट पड़ेगी, शर्मिष्ठा सोच में
[21:50] पड़ते। वो डॉल उसके हाथ में थी, उसने डॉल
[21:54] को उठाकर देखा कहीं इस डॉल के अंदर कोई मशीन तो नहीं जिससे रोने
[21:59] की आवाज आ रही थी। उसने डॉल को अच्छी तरह खंगाल कर
[22:02] देखा पर उसे कुछ नहीं मिला। उसे अब थोड़ा डर लग रहा था
[22:07] क्योंकि रोने की आवाज तो उसने बिल्कुल साफ सुनी थी।
[22:10] और यह डॉल घर के अंदर वापस कैसे आ गई?
[22:14] मानव ने तो उसके सामने पार्किंग वाली स्टोरेज में से रखा था।
[22:18] शुत्ति भी नींद में ही थी। वो इतनी रात में थोड़ी ना घर के
[22:21] बाहर पार्किंग से जाकर डॉल लेकर आए गई।
[22:24] उसने शुत्ति का दरवाजा बंद किया, फिर उस डॉल को अपने रूम में लाकर
[22:28] उसे कपबोर्ड में बंद करके रख दिया।
[22:30] शर्मिष्ठा को अब एक अजीब से डर का अहसास हो रहा था।
[22:34] वो अब शाम से घट रही घटनाओं के बारे में सोच रही थी।
[22:38] ये सब क्या हो रहा था? उसके घर में?
[22:40] ये दूसरी बार था की डॉल घर के अंदर थी और वो रोने की आवाज वो तो
[22:45] उसने एकदम साफ सुनी थी ये सब सोचते सोचते।
[22:49] उसकी आग लग गई। उस देर पीते ही होंगे कि अचानक
[22:54] उसकी एकदम से नींद खुली। वो घबरा कर उठी और उसके गले से एक
[22:59] चीख निकल गई। शर्मिष्ठा शर्मिष्ठा, क्या हुआ
[23:03] तुम्हें? तुम चिल्लाए क्यों?
[23:05] क्या हुआ? मानव।
[23:07] मालूम मुझे ऐसा लगा जैसे जैसे कुछ मेरे शरीर के ऊपर चल रहा था, कुछ
[23:13] भारी सा कुछ बड़ा ये कहता है शैल मिष्टा रोने लगी।
[23:19] अरे, रुको, मैं लाइट जलाता हूँ अभी शायद वो बिल्ली दुबारा घर में
[23:22] कुछ गई है। नहीं माना।
[23:25] जो भी था वो बिल्ली से काफी भारी था।
[23:27] और और और क्या शर्मिष्ठ था। पता नहीं तुम यकीन करोगी कि नहीं
[23:34] तुम यकीन नहीं करोगे माना, लेकिन लेकिन जो कुछ भी मेरे ऊपर चल रहा
[23:39] था उसके उसके उसके चार पैर नहीं दो पैर थे।
[23:46] मानव ने लाइग ऑन किया। शर्मिष्ठा ने उठकर अपना बिस्तर
[23:50] चेक किया। उसके सफेद चादर के ऊपर बहुत सारे
[23:54] छोटे छोटे दो जोड़ी पैरों के निशान थे।
[23:57] पैरों से उसके गले तक मानव मानव के छोटे छोटे पैरों के निशान ये
[24:03] निशान? ने डरते डरते कपबोर्ड की तरफ
[24:06] इशारा किया। कपबोर्ड का एक डोर खुला हुआ था और
[24:10] वो डॉल बुआ भी बाहर लटक रही थी। उसके मुँह पर एक अजीब सी मुस्कान
[24:17] थी। फिर अचानक उसने अपना मुँह एक झटके
[24:20] से शर्मिस्ठा की तरफ मोड़ा। एक डॉलिया कैसे आ गई?
[24:25] मानव ने पीछे मुड़कर उस डॉल को देखा ही था और उसे एक थप सी आवाज
[24:30] सुनाई दी। उसने पीछे मुड़कर देखा।
[24:33] शर्मिष्ठा बेहोश हो गई थी। थोड़ी देर बाद जब उसे होश आया तब
[24:39] उसने मानव को श्रुति के रूम से आने वाली आवाज के बारे में सब कुछ
[24:43] बताया। मानव उस डॉल में कुछ है मैं कह
[24:46] रही हूँ उस डॉल में कुछ है, मुझे लगता है की मेरे ऊपर मुझे लगता है
[24:51] की मेरे ऊपर वो डॉल ही चल रही थी तुमने तो उसके पैर के निशान भी
[24:56] देखे ना? इतने छोटे पैर के निशान उस डॉल के
[24:58] ही थे। पर सर मिष्ठा कोई डॉल कैसे चल
[25:01] सकती है? शायद तुम कोई सपना देख रही थी।
[25:04] नहीं माना। बेहोश होने से पहले उस डॉल ने
[25:07] अपनी गर्दन मूरकर मेरी तरफ देखा था।
[25:09] मैं तब होश में थी, उनसे बात कर रही थी और और वो रोने की आवाज वो
[25:15] तो मैंने, वो तो मैंने और श्रुति ने हम दोनों ने सुनी थी।
[25:18] श्रुति ने तो कहा भी था की मम्मा उस डॉल के अंदर से आवाज आ रही थी
[25:22] पर मैं पागल थी। तब मुझे इस बात पर यकीन ही नहीं
[25:25] हुआ और अब मुझे यकीन हो गया है उस डॉल में जरूर कुछ मानव मैंने उसे
[25:31] कपबोर्ड में बंद करके रखा था फिर वो बाहर कैसे आ गई उसे यहाँ से
[25:36] निकलकर कहीं प्लीज़ फेंक दो। मुझे डर लग रहा है उसे देखकर वो
[25:40] कुछ कर देगी मानव प्लीज़ उसे फेंक दो तुम अब अब मानव को भी डर लग
[25:45] रहा था कुछ तो अजीब था उस दौड़ में।
[25:48] इतनी रात में मैं इसे कहाँ फेंकू शर्मिष्ठा अभी के लिए इसे मैं लॉक
[25:52] करके रखता हूँ कल सुबह होते ही मैं इसे पुलिस स्टेशन दे आऊंगा
[25:56] तुम डरो मत मैं हूँ ना यहाँ। तुम सोने की कोशिश करो।
[26:00] मानव ने उस गुड़िया को कबर्ड में बंद कर कबर्ड लॉक कर दिया।
[26:04] फिर सोनिया आ गया। उन दोनों में से किसी को भी नींद
[26:08] नहीं आई। अगली सुबह आठ बजते ही मानव ने उस
[26:14] डॉल को अपनी गाड़ी की टिक्की में रखा और पुलिस स्टेशन के लिए रवाना
[26:17] हो गया। वो आधे रास्ते पहुंचा ही था कि
[26:20] उसे अचानक शर्मिष्ठा का कॉल आए। हाँ, शर्मिष्ठा बोलो।
[26:24] मानव मानव वो डॉल, वो डॉल। वो डॉल क्या?
[26:29] मानव वो डॉल अभी भी श्रुति के रूम में।
[26:31] क्या हौ इस यू डूइंग पॉसिबल सर मिष्ठा मैंने खुद उसे डिक्की में
[26:35] रखा है और मैं 10 मिनट में पुलिस स्टेशन पहुंचने वाला हूँ।
[26:38] नहीं माना वो डॉल यहीं पर है। तुम गाड़ी रोक और चेक करो।
[26:42] बच्चे स्कूल गए हैं। मुझे मुझे बहुत डर लग रहा है,
[26:45] मुझे बहुत डर लग रहा है। माना मैं ज्योति का रूम साफ करने
[26:48] गयी थी तो वो डॉल मुझे वहाँ दिखी। तो तो?
[26:52] प्लीज़ घर वापस आ जाओ, तुम घर वापस आ जाओ, मानव प्लीज़।
[26:55] ठीक है रिलैक्स। मैं वापस आ रहा हूँ तुम पैडरूम
[26:59] में जाकर बैठो और दरवाजा बंद कर लो।
[27:02] फ़ोन कटकर मानव ने अब अपनी गाड़ी साइड में रोकी और टिक्की खोलकर
[27:07] देखा। पहाड़ी में सच में वो डॉल नहीं
[27:09] थी। मानव को बहुत अच्छी तरह से याद था
[27:13] की उसने खुद अपने हाथों से डॉल को डिक्की में रखा था।
[27:16] और फिर वो गाड़ी लेकर निकल गया था।
[27:18] ना वो रास्ते में कहीं रुका ना उसने डिक्की खोली।
[27:22] फिर वो डॉल घर वापस कैसे पहुँच गई?
[27:24] वो फटाफट गाड़ी में बैठा और घर के लिए निकल गया।
[27:30] माशर पृष्ठ डर से कांप रही थी। उसके कपड़े पसीने से गिले हो चूके
[27:35] थे। अचानक उसे श्रुति के रूम के
[27:38] दरवाजे के ज़ोर से घुलने की आवाज आई।
[27:41] फिर कोई धीरे धीरे चलकर श्रुति के रूम से बाहर निकला और उसके बैडरूम
[27:47] के दरवाजे की तरफ बढ़ने लगा। शर्मिष्ठा डर से सिसक रही थी।
[27:57] उसने कांपते हुए हाथों से एक चेयर दरवाजे पर टिका दिया और आकर
[28:01] कार्नर में खड़ी हो गई। दरवाजे के पास पहुँचकर वो पैरों
[28:05] की आवाज रुक गई। फिर अचानक दरवाजे पर कोई बहुत
[28:11] ज़ोर ज़ोर से मुक्केम आने लगा। दरवाजा ज़ोर से हिलने लगा।
[28:15] शर्मिष्ठा को लग रहा था कि दरवाजा कभी भी टूट जाएगा।
[28:18] फिर अचानक वो आवाज आनी भी बंद हो गई।
[28:23] फिर दरवाजे के दूसरी तरफ से एक आवाज आई।
[28:27] आंटी आंटी में लीला, आप दरवाजा नहीं खोलोगे।
[28:34] खोलो ना अंती। शर्मिष्ठा के शरीर में सिहरन दौड़
[28:38] गई की आवाज सच में लीला की थी। वही लीला जिसके अंतिम संस्कार में
[28:44] वो और मानव दोनों गए थे। इसका मतलब इसका मतलब उस गुड़िया
[28:48] में उस गुड़िया में लीला की आत्मा थी।
[28:53] चली जाओ लीला प्लीज़ तुम चली जाओ, मुझे बहुत डर लग रहा है लीला तुम
[28:59] प्लीज़ चली जाओ बेटा चली जाओ पर आंटी मैं तो आपके पास रहने आई हूँ
[29:04] ना याद है ना आपको, आप मुझे हमेशा कहती थी तुम्हारी सौतेली मम्मी
[29:10] अच्छी नहीं तो क्या हुआ लीला मैं तो हूँ।
[29:13] ना? मैं और अंकल तुम्हारा हमेशा ध्यान
[29:15] रखेंगे श्रुति की तरह तो अब मैं वापस आ गई हूँ अब आप और अंकल मेरा
[29:21] ध्यान रखोगे ना आंटी, तेरी मम्मी ने तो मुझे मार दिया और आप आप?
[29:28] मुझे प्यार करोगे ना? नहीं लीला, तुम अब यहाँ नहीं रह
[29:32] सकती बेटा। मैं और अंकल तुमसे बहुत प्यार
[29:36] करते थे, पर अब तुम अब दूसरी दुनिया जा चुकी हो लीला तुम तुम
[29:41] आज चली जाओ बेटा तुम अब इस दुनिया में नहीं रह सकती तुम तुम लौट जाओ
[29:46] अपनी दुनिया में लीला लौट। जाओ दूसरी दुनिया तो क्या हुआ
[29:52] आंटी? मैं आपको और अंकल।
[29:54] को भी उस दूसरी दुनिया में ले चलूँगी नहीं तो हम तीनों मिलकर
[29:58] साथ रहेंगे। ना बोलो ना कितना मज़ा आएगा पर
[30:01] दरवाजा खोलो ना। अब ऐसा कहकर लीला फिर दरवाजे पर
[30:09] मुक्के मारने लगे। झर्मेचा की गली से अब एक छप बाहर
[30:12] नहीं निकल रहा था। वो चुपचाप जमीन पर बैठ डर से
[30:15] कांपते हुए मानव का इंतजार कर रही थी।
[30:19] थोड़ी देर बाद जब मानव घर लौटा वो अपने ही घर को पहचान नहीं पा रहा
[30:24] था। ऐसा लग रहा था मानो घर में कोई
[30:26] तूफान आया था। पूरे घर का सामान चारों तरफ फैला
[30:30] हुआ था और चारों तरफ दीवारों पर खून से बड़े बड़े अक्षरों में
[30:35] लीला लिखा हुआ था और उसके अपने बैडरूम के बाहर जमीन पर दरवाजे से
[30:40] टिक कर लीला की डोल बैठे थे। उस गुड़िया के दोनों हाथ बिल्कुल
[30:46] लाल थे, मानो खून से रंगे हो और उसके मुँह पर।
[30:49] एक अजीब सी मुस्कान थी। मानव ने उस गुड़िया को उठाकर हॉल
[30:53] में फेंक दिया और किसी तरह दरवाजा खोला।
[30:56] शर्मिष्ठा अंदर बेहोश पड़ी थी। उसने शर्मिष्ठा को उठाया और कार
[31:01] में बैठा कर उसे डॉक्टर के पास ले गया।
[31:04] शर्मिष्ठा के होश में आने पर सब कुछ जानकर मानव ने वहीं से अपने
[31:09] एक दोस्त को फ़ोन किया और सब बताया जब उसके दोस्त ने एक साधु
[31:14] का नंबर उसे दिया जो ऐसी शक्तियां को काबू कर सकता था।
[31:18] मानव ने साधु को फ़ोन किया और सब कुछ बताया और अगले ही दिन घर पर
[31:22] पूजा विधि करने को कहा। उसराद मानव, शर्मिष्ठा और श्रुति।
[31:28] होटल में ही रहे। अगले दिन चर्मिष्णा मानव और वो
[31:32] साधु पूजा के सामान के साथ घर पर पहुंचे।
[31:36] वो डॉल आज सोफा पर बैठी हुई थी। दीवारों पर चारों तरफ खून से बहुत
[31:42] कुछ लिखा हुआ था। साधु ने बिना वक्त गँवाए क्रिया
[31:46] आरंभ की। और तीन सुरक्षा चक्र बनाए और उस
[31:49] डॉल को उन तीनों चक्रों के बीच में रख दिया।
[31:52] फिर वो मंत्र जाप करने लगे। पहले कुछ देर तो कुछ नहीं हुआ और
[31:57] धीरे धीरे उस डॉल के अंदर से डरावनी आवाजें आने लगी।
[32:01] कभी लीला की आवाज और कभी किसी आदमी की।
[32:05] ऐसा लग रहा था मानो कोई दर्द से चिल्ला रहा हो पृथ्वीरे धीरे वो
[32:16] आवाज़ पानी बंद हो गई। तीन साढ़े 3 घंटे की विधि के बाद
[32:21] उस पंडित ने उस गुड़िया का विधि के अनुसार अंतिम संस्कार कर।
[32:25] उसे यज्ञ की अग्नि में जला दिया। फिर घर की सुरक्षा के लिए
[32:30] उन्होंने घर में चारों तरफ शांति, जल, चड़काया और फिर मानव और
[32:35] शर्मिश ना से कहा। कई बार हम अनजाने में कुछ ऐसी
[32:39] बातें कह जाते हैं बेटा जिसका फल हमें बाद में भुगतना पड़ता है।
[32:45] आप दोनों का लीला को अपने बच्चे की तरह देखना और उसे ये कहना कि
[32:49] हम तुम्हारा हमेशा ध्यान रखेंगे, इस बात को लीला कभी भुला नहीं
[32:53] सकी। लीला की सौतेली माँ ने सच में उसे
[32:56] मरवाया है या नहीं, ये तू पुलिस पता करेगी।
[32:59] पर वो आप दोनों को अपने माता पिता से भी ज्यादा प्यार करती थी।
[33:03] ये बात फकी है। प्यार की कमी ने उसे आप दोनों के
[33:07] और करीब कर दिया था। शायद इसीलिए जो सपना वो जीवित
[33:11] रहते हुए पूरा नहीं कर पाई वो उसने मरने के बाद पूरी करने की
[33:15] सोंची अपनी सबसे प्यारी चीज़ उस गुड़िया को उसने काबू किया और
[33:20] उसके जरिए अपनी अधूरी इच्छाओं को पूरा करने की कोशिश की।
[33:24] इससे पहले की कुछ अनहोनी हो जाती है।
[33:26] हमने उसे रोक दिया है। वरना क्या पता आप दोनों का प्यार
[33:30] वापस पाने के लिए वो आप दोनों या फिर आपकी बेटी के साथ कुछ गलत
[33:35] करते थे? शर्मिष्ठ और मानव चुप थे।
[33:38] उन्होंने लीला की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।
[33:41] उस दिन के बाद उनके साथ कोई अनहोनी घटना नहीं घटी, पर दो
[33:45] महीने बाद उन्होंने वो घर छोड़ दिया।
[33:49] उस घटना को अब छः महीने बीत चूके हैं।
[33:52] रोहित और सुप्रिया अपनी बेटी साक्षी के साथ एक हफ्ते पहले उनके
[33:57] घर में शिफ्ट हुए हैं। संडे को रोहित टीवी पर क्रिकेट
[34:01] मैच देख रहा था, तभी दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी।
[34:06] दरवाजे पर दस्तक सुन रोहित ने दरवाजा खोला पर बाहर कोई नहीं था।
[34:12] दरवाजा बंद करने के लिए उसने जैसे ही हाथ बढ़ाया उसने देखा कि सामने
[34:16] जमीन पर न्यूसपेपर में रैप किया हुआ।
[34:19] एक बड़ा सा पासन पड़ा था। उसने न्यूसपेपर हटाकर देखा, अंदर
[34:26] एक गुड़िया थी। ठेली, ठेली, पोक।
[34:48] सूरज ढल चुका था जब विजय सिंह ने अपने गांव कल्याणपुर में अपनी
[34:53] पुरानी हवेली के दरवाजे पर कदम रखा, वो 23 साल बाद विदेश से ही
[34:57] गांव लौटा था। एक अजीब सी डरावनी आवाज के साथ वो
[35:02] लकड़ी का विराट दरवाजा। झरमराता हुआ खुल गया अजीब सी एक
[35:06] धूल की एक कंध उसके नाक में घर कर गई।
[35:10] उसने चारों तरफ देखा हवेली अब पहले जैसी नहीं थी, दीवारों पर
[35:14] बेलों और जंगलों का कब्जा हो चुका था।
[35:17] अरे कौन में भाई रुक जाओ, रुक जाओ, अंदर मत जाओ।
[35:22] हवेली के अंदर मत जाओ भाई मरना है क्या तुम्हे अचानक विजय को दूर से
[35:28] एक आवाज सुनाई दी पीछे करीब 40 सात दूर हवेली के गेट के बाहर दो
[35:33] बुजुर्ग गांव वाले खड़े थे। उनके चेहरे पर डर था।
[35:37] विजय धीरे धीरे चलता हुआ उन बुजुर्गों के पास पहुंचा।
[35:41] नमस्ते चाचा। मैं विजय जमींदार राघव सिंह का
[35:45] पोता आप कुछ कह रहे थे। ये सुनते ही दोनों गांव वालों ने
[35:49] एक दूसरे को हैरानी से देखा। नमस्ते बेटा मैं दिनकर और ये
[35:54] रामलाल हम लोग गांव में ही रहते हैं।
[35:57] दरअसल यहाँ जो हुआ। उसके बाद हमें लगता है कि तुम्हें
[36:03] कभी वापस से नहीं आना चाहिए था। यहाँ जो हुआ मैं कुछ समझा नहीं।
[36:08] चाचा तुम्हें दूसरे आदमी ने पहले आदमी को कोहनी मार कर चुप करते
[36:12] हुए बात बदलते हुए कहा, अरे कुछ नहीं।
[36:16] दिनकर कह रहा है कि तुम विदेश में पढ़ने चले गए थे ना बेटा?
[36:20] कभी वापस नहीं आए तो हमे लगा की तुम कभी नहीं लौटोगे, बस और कुछ
[36:25] नहीं। और आप कुछ मरने की बात कर रहे थे
[36:29] ना? चाचा नहीं नहीं वो तो हम तुम्हे
[36:32] रोक रहे थे क्योंकि अवेल की हालत ठीक नहीं है ना जगह जगह से दूर
[36:37] चुकी है बस इसलिए। अच्छा अब हम चलते है नमस्ते कह कर
[36:41] वो दोनों आदमी हड़बड़ाहट में वहा से चले गए।
[36:44] विजय को कुछ अजीब सा लगा वो जानता था की वो आदमी झूट बोल रहा था।
[36:55] उस रात विजय अपने पुराने कमरे में सोया हुआ था।
[36:58] जब एक आवाज ने उसे चगा दिया दूर पहली मंजिल के कमरे में कोई आदमी
[37:07] डर से चिल्ला रहा था और उसकी आवाज पूरी हवेली में गूंज रही थी।
[37:13] विजय बिस्तर पर उठकर बैठ गया। क्नॉइस।
[37:16] आवाज बहुत डरावनी थी। मन जो भी चिल्ला रहा था कोई उसे
[37:20] बहुत याद ना दे रहा हो। विजय कमरे के बाहर आया।
[37:24] हवेली के पहली मंजिल के किसी कमरे में शायद कोई बंद था और चीख रहा
[37:29] था। आवाज अब और अच्छे से सुनाई देने
[37:34] लगी थी। क्नॉइस।
[37:35] विजय आवाज का पीछा करते हुए एक अंधेरे कॉरिडोर में पहुंचा जहाँ
[37:40] बहुत सारे दरवाजे थे। दोनों तरफ दीवारों पर बड़े बड़े
[37:45] पैंटिंग्स लगी हुई थी। जैसे ही वो आगे बढ़ा उसे महसूस
[37:49] हुआ। इस जगह पर पाखी हवेली की तुलना
[37:52] में तापमान काफी कम था। वो चीख अब और तेज हो गई थी और उस
[37:59] चीख के साथ अब किसी के हंसने की भी आवाज आ रही थी।
[38:07] हाँ हाँ, हाँ हाँ हाँ हाँ। विजय ने अपने कदम पेश किए और
[38:12] दरवाजों को एक एक कर खोलकर देखने लगा।
[38:16] उसे अब ऐसा लग रहा था मानो पैंटिंग में बनी आकृतियों की
[38:19] आंखें उसे देख रही थी। तीन दरवाजे खोलने के बाद कॉरिडोर
[38:24] के अंत में अचानक उसे अपने दादा राघव सिंह का एक पोर्ट्रेट दिखा।
[38:30] वो पोर्ट्रेट इतना बड़ा था कि एक क्षण के लिए तो उसे लगा कि वहाँ
[38:34] कोई वाकई में खड़ा था। विजय वहीं खड़ा हो गया और
[38:39] पोर्ट्रेट को देखने लगा। उस पोर्ट्रेट में जमींदार राघव
[38:42] सिंह की आँखें डरावनी और अजीब थी। मानो उनमें जान हो और वो विजय को
[38:48] घूर रही थी। तभी एक आवाज आई मानो कोई दरवाजा
[38:54] खोल बाहर आकर किसी टेबल से टकराया हो।
[38:58] कौन है वह? विजय ने हल्की आवाज में पूछा और
[39:02] चारों तरफ अब बिल्कुल सन्नाटा था। विजय ने डर डर के दोबारा उस
[39:06] पैंटिंग की तरफ देखा और उसके शरीर में बिजली दौड़ गई।
[39:11] राघव सिंह के फौटों के ठीक सामने एक शरीर खड़ा था, करीब छः फिट
[39:16] लंबा कुरते पजामे में पर बिना किसी सर का विजय के पैर वहीं जम
[39:24] गए। वह सरकते आदमी के गले से काफी खून
[39:27] बाहर गिर रहा था। जैसे आसपास की जमीन अब गीली हो
[39:31] रही थी। एक अजीब सी आवाज़ वो शरीर के अंदर
[39:34] से आ रही थी। कुछ सेकण्ड्स वो सरका था, उसी
[39:37] फोटो के सामने खड़ा रहा। फिर उसने धीरे धीरे अपने दोनों
[39:41] हाथ ऊपर किये और तेजी से विजय की तरफ बढ़ने लगा।
[39:45] विजय अंदर तक काँप गया था। वो बस किसी तरह भागते भागते अपने
[39:50] कमरे पहुंचा और फिर उसने दरवाजा बदल दिया।
[39:54] बाकी के रात वो जाग रहा क्योंकि उसे पता था कि वो सरकटा उसके
[39:59] दरवाजे के बाहर ही घूम रहा था। अगली सुबह विजय ने गांव वालों से
[40:09] जवाब लेने की सोंची वो गांव के बुजुर्ग प्रसाद जीके पास पहुंचा
[40:13] जो एक बरगद के पेड़ के नीचे बैठे थे।
[40:16] आसपास कुछ और लोग भी जमा थे। नमस्कार प्रसाद जी, मेरे परिवार
[40:21] के साथ क्या हुआ था, मुझे बताइए, विजय ने पूछा।
[40:25] उसकी आवाज़ बाहर से शान्ति, लेकिन उसके अंदर एक तूफ़ान चल रहा था।
[40:30] प्रसाद जी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
[40:32] इस बारे में तुम जितना कम जानो बेटा उतना ही अच्छा है और मेरी
[40:36] मानो तो तुम वापस चले जाओ, तुम्हारी जान को खतरा है।
[40:44] मुझे पता है कि मेरी जान को खतरा है।
[40:47] कल रात विजय चुप हो गया। प्रसाद जी आप मुझे बताएं कि सच
[40:52] क्या है? बचपन में जब माँ, बाबा, दादा,
[40:55] दादी और बाकी परिवार वाले गुजर गए तब सबने मुझसे कहा था कि उनका
[41:00] अक्सीडेंट हुआ था, लेकिन अब मुझे लगता है क्नॉइस।
[41:03] ये सब ने मुझसे झूठ कहा था। कोई तो बात है, हर कोई मुझे वापस
[41:08] जाने को क्यों कह रहा है? कल उन दो गांववालों ने अनजाने में
[41:13] कहा कि मेरी जान को खतरा है कल रात जो मैंने देखा और आज आप भी सच
[41:20] क्या है? क्नॉइस?
[41:21] मुझे प्लीज़ बताइए प्रसाद जी तुमने गलत तुमने गलत उसे देखा।
[41:27] प्रसाद जी ने विजय से पूछा किसे? विजय ने कहा प्रसाद जी चुप रहे तब
[41:33] जाके विजय ने कल रात की बात सबको बताई।
[41:36] विजय की बात सुनते ही सब घबरा कर एक दूसरे को देखने लगे और भगवान
[41:40] का नाम लेने लगे। दबी आवाज में सब कहने लगे, अब
[41:47] प्रसाद जी ने विजय को सच बताया। तुम्हारे दादाजी जमींदार राघव
[41:52] सिंह ने एक दुष्ट देवी देवी नरकनी को पूजा और विधियों द्वारा जागरूक
[41:59] किया। ये सब उन्हें काले शक्तियां के
[42:02] लिए तंत्रिक ने सिखाया जिसका नाम जगदीशवर था।
[42:07] तांत्रिक की मदद से उन्होंने देवी नरगिनी के साथ एक समझौता किया।
[42:12] धन और शक्ति पाने के लिए उस समझौते के मुताबिक हर रमावस की
[42:18] रात देवी को। एक नर बली भेंट देनी पड़ती थी।
[42:23] बदले में देवी नरकनी जमींदार को धन, दौलत, शोहरत, उनकी जो भी
[42:29] इच्छा थी उसको पूरा करते थे। हर अमावस की रात हवेली में
[42:34] दर्दनाक चीखें गूंजती थी। सालों तक राघव सिंह ने गांव वालों
[42:39] की बलि चढ़ाई, उनका खून हवेली की मिट्टी में बहाया, गांव की
[42:44] जनसंख्या कम होने लगी पर संविधान नहीं रुके।
[42:49] उनके लालच का जैसे कोई अंध ही नहीं था, लेकिन सबसे बड़ा जल तब
[42:54] हुआ जब उन्होंने एक बार नरबली के लिए उपयुक्त किसी को ना पाकर
[43:00] तांत्रिक को ही छल से बले चढ़ा दिया।
[43:03] वह तांत्रिक जो देवी नरगिनी का सीधा साधक था।
[43:08] वो तांत्रिक जिसने जमींदार को ये विधियों सिखाई वो तांत्रिक जो
[43:13] पूरे जीवन उनकी सेवा में लगा रहा तांत्रिक के मौत के बाद वो सरकंडा
[43:19] बन गया जो तुम्हारे परिवार से बदला लेना चाहता था।
[43:24] पूरे परिवार को खत्म करना चाहता था।
[43:27] और उसने ऐसा ही किया। उसके मौत के बाद सरकटा बनकर वो हर
[43:33] अमावस्या को तुम्हारे परिवार के किसी ना किसी सदस्य की बलि देता
[43:38] रहा। देवी नरकनी को और धीरे धीरे
[43:42] तुम्हारा पूरा परिवार खत्म हो गया।
[43:47] नर बली उसके बाद बंद हो गई। पर अगर कोई तुम्हारे हवेली में
[43:52] जाता है तो फिर कभी बचकर नहीं आता, वो सरकटा उसकी भी बलि दे
[43:58] देता है। देवी को आज भी हर रमावस्या को
[44:02] हवेली से यज्ञ के मंत्र सुनाई देते हैं।
[44:05] क्नॉइस वो सरकटा आज भी देवी की पूजा करता है तुम उस श्राप में
[44:10] धवेली में मत रहो बेटा तुम अगर वहाँ लौटे तो वो सरकटा तांत्रिक
[44:17] तुम्हारी भी बलि चढ़ा देगा। देवी नरकनी को देवी रक्त की
[44:21] प्यासी है। और हम नहीं चाहते कि कोई औरनर बली
[44:25] हो और देवी जाग जाए। प्रसाद जी ने विजय से कहा विजय
[44:33] पूरे दिन गांव में ही रहा। उस शाम जब विजय गांव से हवेली
[44:37] लौटने के लिए उठा गांव के माहौल में एक बदलाव था।
[44:41] गांव वाले धीरे धीरे बातें कर रहे थे और डर भरी नजर से उसे देख रहे
[44:46] थे। अपने दादा के हरकतों का सज जाने
[44:48] के बाद विजय हवेली पहुंचा। गांव वालों की बात ने उसे अंदर तक
[44:53] हिला दिया था। उसे इन बातों पर यकीन नहीं हो रहा
[44:56] था और ये सच था। क्नॉइस की उसने कल रात एक बिना
[45:00] असर वाले आदमी को देखा था। उसने बात की तह तक जाने की सोंची।
[45:05] उसने पुराने और धूल से भरे हुए कमरों में तलाशी शुरू की।
[45:09] किसी भी जानकारी की तलाश में लाइब्रेरी में उसे राघव सिंह का
[45:14] एक पुराना डायरी मिला जिसमे। बलियों और देवी के आदेश का जिक्र
[45:19] था। जब उसने डायरी पढ़ा तो उसके
[45:22] दादाजी के पापों का सच उसके सामने उजागर हो गया।
[45:28] राघव सिंह ने देवी को हर महीने एक बलि देने का वादा किया था, लेकिन
[45:33] जब उसे कोई गांव वाला नहीं मिला। तो उसने उस तांत्रिक की ही बली
[45:37] चढ़ा दी जिसने उसकी मदद की थी। ये समझौता टूटा और इससे उसके
[45:43] परिवार पर श्राप लग गया। उस रात विजय को नींद नहीं आ रही
[45:47] थी। 11:00 बजे वो रूम से बाहर निकला
[45:51] और उसने पहली मंजिल पर बने उस मंदिर को ढूंढने की सोंची।
[45:55] जहाँ नर्बली होती थी, एक अजीब सी डर के साथ विजय हवेली के पुराने
[46:00] और छुपे हुए हिस्सों में मोबाइल की लाइट लेकर मंदिर को ढोने लगा
[46:05] पर उसे कोई मंदिर नहीं मिला। उस सोच में पड़ गया तो क्या मंदिर
[46:10] कहीं और है? पर डायरी में भी यही दिखा था कि
[46:13] मंदिर हवेली में ही थी। विजय ये सब सोच ही रहा था कि
[46:16] अचानक एक आवाज उसके कान में गूंजने लगी।
[46:22] एक बहुत ही दब्बी सी आवाज मानो कोई किसी मंदिर में आरती का
[46:27] नगाड़ा बजा रहा हो धम धम धम वो आवाज।
[46:32] अब उसे साफ सुनाई दे रही थी। साथ ही में शंक और घंटियों की
[46:37] आवाज विजय उस आवाज का पीछा करते हुए आंगन की एक खुली जगह पर
[46:42] पहुंचा। आवाज वहाँ जमीन के नीचे से आ रही
[46:45] थी। उसने वहाँ से धूल, मिट्टी और सूखे
[46:47] पत्ते हटाये क्नॉइस। वहाँ एक छोटा सा गुप्त द्वार था
[46:51] और उसके नीचे सीढ़ियाँ थी जो नीचे अंधेरे में कहीं घुल गई थी।
[46:57] उसने मोबाइल की लाइट ऑन की और उन अंधेरे सीढ़ियों से नीचे उतरने
[47:01] लगा। अगरबत्ती की एक तेज सुगंध से
[47:05] महसूस होने लगी थी सीढ़ियों खत्म होने पर।
[47:08] वो एक अंधेरे कमरे में था जो किसी पत्थर की गुफा जैसा लग रहा था और
[47:13] उस गुफा की एक दिवार पर आठ फुट लंबी एक देवी की प्रतिमा थी।
[47:19] एक भयंकर देवी की देवी के बाल पैरों तक थे खुले और बिखरे हुए।
[47:26] उसका शरीर काला था और शरीर पर लाल रंग की साड़ी थी।
[47:31] उसकी जीभ बहार और लाल रंग की थी। शरीर की नसें उभरी हुई और उसकी
[47:37] आंखें बहुत बड़ी और क्रोध से भरी हुई थी और देवी के एक हाथ में एक
[47:44] लकड़ी की कटोरी। और दूसरे हाथ में एक भड़क था।
[47:48] दोनों पर ही सूखा खून लगा हुआ था और देवी के पैरों के सामने बलि
[47:53] देने की भेदी लगी थी। इसका मतलब ये वही मंदिर था जहाँ
[48:00] जमींदार नर बलि देता था। विजय डर से वहीं जम गया।
[48:05] इतनी भयंकर देवी की प्रतिमा उसने अपने पूरे ज़िन्दगी में कभी नहीं
[48:10] देखी थी। देवी के सामने फूल और पूजा की
[48:14] बाकी सामग्री भी थी। मानो वहाँ कोई रोज़ पूजा करता हुई
[48:19] विजय को ये सब देख यकीन ही नहीं हो रहा था।
[48:22] उसने कैमरा ऑन किया। और फ्लैश ऑन करके फोटोस खींचने
[48:26] लगा। इतने अंधेरे में फ़ोन के लाइट से
[48:29] सब ठीक से नहीं दिख रहा था। उसने फोटो देखने के लिए फ़ोन हाथ
[48:33] में लिया और उसकी सांसे रुक गई। उस फोटो में दीवार के एक कोने में
[48:42] कोई खड़ा था। चुपचाप विजय डर से कांप रहा था।
[48:49] वो डर डर के पीछे मुड़ा और उससे चार हाथ दूर छः फिट लंबा वो सर
[48:57] कटा खड़ा था। विजय को फूंडते हुए विजय का शरीर
[49:09] डर से जम गया था। सामने वह सरकटा खड़ा था, उसके हाथ
[49:16] विजय की तरफ बढ़ रहे थे। उसने अपने आप को संभालने की बहुत
[49:20] कोशिश की। लेकिन उसके पैरों में ज्यादा ताकत
[49:23] नहीं थी। उसने अपनी सांस रोकते हुए एक कदम
[49:27] पीछे किया पर गुफा के जमीन पर इतने सूखे पत्ते थे कि बिना आवाज
[49:32] किये वो कहीं नहीं जा सकता था। सरकटा का एक हाथ धीरे धीरे अब
[49:37] उसकी तरफ बढ़ रहा था। विजय के हाथ कांपने लगे और उसका
[49:41] फ़ोन वहीं गिर गया। उसने पलट कर भागने की कोशिश की,
[49:45] लेकिन अब देर हो चुकी थी। सर्कटा का एक हाथ उसके सिर पर था।
[49:50] उसने विजय के सिर को एक गेंद की तरह पकड़ लिया और अपने शरीर के
[49:53] पास खींचने लगा। सड़े हुए मांस की बदबू से विजय का
[49:58] दम घुट रहा था। उसने अपने आप को छुड़ाने की कोशिश
[50:01] की, लेकिन सरकटा की पकड़ बहुत मजबूत थी।
[50:04] उसने विजय के सिर को दोनों हाथों से पकड़ा और उसे ऊपर उठाना शुरू
[50:07] किया। उसके पैर अब हवा में लटक रहे थे।
[50:12] विजय के पूरे शरीर में दर्द हो रहा था।
[50:14] उसको लग रहा था कि सरकटे की उंगलियों के ज़ोर से उसका सर फट
[50:17] जाएगा। सरकटे की उंगलियां विजय के सिर के
[50:21] इर्द गिर्द खड़ी हुई थी। जैसे वो उसका सर धड़ से अलग करना
[50:25] चाहता हुआ विजय दर्द से कराह रहा था सरकटे के कटे हुए गले से खून
[50:31] उछल उछल कर बाहर गिर रहा था। विजय का दम घुटने लगा।
[50:35] उसने अपनी पूरी ताकत जोड़कर एक ज़ोर से लात मारी और सर कथा एक
[50:40] कदम पीछे हट गया। विजय जमीन पर गिर गया।
[50:45] ये मौका देखकर विजय ने गुफा से भागने की कोशिश की।
[50:51] वो सरकटे से खुद को बचाकर भागा पर अंधेरे के कारण वो सीढ़ियों तक
[50:55] नहीं बल्कि गुफा के दूसरे हिस्से में पहुँच गया, जो ज्यादा गहरा और
[51:00] डरावना था। जैसे ही विजय गुफा के इस दूसरे
[51:03] हिस्से में पहुंचा, मक्खियों की आवाज़ से उसके कान गूंज उठे।
[51:07] वो संभाले हुए आगे बढ़ने ही वाला था कि एक भयानक दृश्य देख उसके
[51:11] पैर वहीं जम गए। जमीन पर एक आदमी का सड़ा गला शव
[51:17] पड़ा था, जिसका सर शरीर से अलग पास में पड़ा था।
[51:23] एक विवादित गंज से गुफा का वो कोना भरा था।
[51:28] शरीर, सर, जमीन सब कुछ सूखे खून से रंगा हुआ था।
[51:32] उस शरीर के फटे हुए कपड़े खून से लथपथ थे और उस कटे हुए सिर की
[51:37] आंखें शायद उनको उन कीड़ों ने खा लिया था।
[51:42] विजय का दिल उस दृश्य को देखकर थम गया।
[51:46] और उसे ज़ोर से उलटी आने लगी। उसने अपने मुँह को दबाया लेकिन
[51:50] गुफा की अजीब सी हवा और उस शव से उठती हुई दुर्गन्ध उसके नाक में
[51:55] घिर गई थी। विजय अपनी उल्टी को रोकने की
[51:58] कोशिश कर रहा था। जब वो भागने लगा तभी उसके पांव के
[52:03] नीचे उसने कुछ महसूस किया। उसने नीचे देखा और वो हिल गया।
[52:09] जमीन पर हजारों इंसानी हड्डियों, शरीर के गले, अंग और उंगलियां
[52:14] बिखड़ी पड़ी थी। कुछ मालाएँ जमीन पर थी जिन्हें
[52:18] शायद सड़ी गली उन उंगलियों को धागों में पैरो पर बनाया गया था।
[52:23] वो कुछ कदम आगे बढ़ा ही था की अचानक उसके पीठ पर ज़ोर से कोई
[52:27] भारी चीज़ आकर टकराई। इससे उसका संतुलन बिगड़ गया और वो
[52:32] गिर गया। उसने देखा बिना आँखों वाला कटा
[52:35] हुआ सर अब उसके पैरों के पास पड़ा था विजय डर से पीछे मोड़ा क्नॉइस।
[52:42] वो सर उसके शरीर पर सर कटे ने दे मारा था।
[52:47] वो अब उसके ठीक पीछे खड़ा था और उसके हाथ में एक इंसानी कटा हुआ
[52:52] हाथ था जो उसने उठाकर विजय के शरीर पर दे मारा।
[52:57] उस कटे हुए हाथ से निकले हुए कीड़े विजय के शरीर पर चिपक गए।
[53:01] डर से विजय के गले से एक भयानक चितकार निकली।
[53:04] विजय समझ चुका था उसे अपने आप को बचाना होगा वरना वो सरकटा उसे भी
[53:10] वहीं काटकर देवी को अर्पण कर देगा।
[53:14] वो अपनी पूरी शक्ति जोड़कर खड़ा हुआ और इस बार उसने अपने हाथ से
[53:18] एक बड़ा सा पत्थर उठाया। उसने उस पत्थर को सरकटे पे फेंक
[53:23] मारा और सरकटा संतुलन बिगड़ने के कारण गिर गया।
[53:27] ये मौका देखकर विजय गुफा के मुहाने की तरफ भागने लगा।
[53:31] सरकटा भी उठकर उसके पीछे जाने लगा, लेकिन विजय ने अपनी सारी
[53:35] ताकत लगाकर गुफा के बाहर निकलने का रास्ता ढूंढ ही लिया।
[53:39] हर एक कदम के साथ उसकी सांसे तेज होती जा रही थी और उसका शरीर
[53:43] गंदगी और कीड़ों से भरा हुआ था। गुफा के मुहाने तक पहुंचते ही
[53:48] उसने अपनी सारी ताकत जोड़कर वो गुप्त दरवाजा खोला और वो बाहर आ
[53:52] गया। उसका शरीर अब भी कांप रहा था
[53:56] लेकिन उसने अपनी जान बचा ली थी। उसने एक भारी पत्थर उठाया और उस
[54:00] गुप्त द्वार को बंद कर दिया। कुछ ही मिनटों में सरकटा दरवाज़े
[54:04] के उस बाहर पहुँच गया और विवाद से आवाज़ के साथ दरवाज़ा खोलने की
[54:10] कोशिश करने लगा। से चुपचाप खड़ा ये सब देख रहा था
[54:15] पर सरकार का दरवाज़ा नहीं खोल पाया।
[54:17] कुछ और भयानक चित्रकारों के साथ धीरे धीरे वो उस गुफा के अंदर लौट
[54:22] गया। विजय जमीन पर बैठ गया।
[54:25] उसके शरीर में अब कोई ताकत नहीं बची थी।
[54:28] वो समझ चुका था कि उसका सामना एक बहुत ही काली और विकृत शक्ति के
[54:33] साथ हुआ है। सरकटा और देवी नरकनी का श्राप अब
[54:37] भी उसके ऊपर था और असली खौफ से उसका सामना होना बाकी था।
[54:48] अगली सुबह विजय के दिल में पिछली रात की घटनाएं अब भी घर की हुई
[54:53] थीं। उसका दिमाग अब तक सरकटे के खौफ से
[54:57] उबर नहीं पाया था, लेकिन उसने अपने मन को मजबूत कर लिया था।
[55:01] उसने ठान लिया था कि देवी नरकनी और सरकटे के श्राप से इस गांव को
[55:06] बचाना है और यही उसका मकसद है प्रसाद जी को सब कुछ बताने पर।
[55:11] उन्होंने उसके डर को समझा और उसे एक रास्ता दिखाने का फैसला किया।
[55:17] वो विजय को एक बूढ़े तांत्रिक के पास ले गए जो अपनी काली विद्या के
[55:20] लिए बहुत मशहूर थे। ये तांत्रिक 90 साल के थे और अपनी
[55:25] तंत्र विद्या के जरिए अनेक आत्मा और श्रापों का अंत कर चूके थे।
[55:29] पर अब क्नॉइस। उम्र के चलते उन्होंने बिस्तर
[55:31] पकड़ लिया था। प्रसाद जी विजय को एक घने जंगल से
[55:34] होते हुए एक छोटी सी झोपड़ी तक ले गए।
[55:38] अंदर एक बहुत ही बूढ़ा आदमी बिस्तर पर बैठा था।
[55:41] प्रसाद जी ने विजय का परिचय दिया और उसके मानसिक स्थिति के बारे
[55:45] में भी उन्हें बताया। तांत्रिक के होठों पर एक मुस्कान
[55:48] थी। जैसे उसने विजय की मन की बात समझ
[55:51] ली हो। तांत्रिक ने विजय से कहा तुम्हारा
[55:55] सामना एक बहुत ही भयानक शक्ति से हुआ है बेटा लेकिन तुम अभी तक
[56:00] जिंदा हो? इसका मतलब है कि देवी नरगनी और
[56:04] सरकटे की शक्तियां तुम्हें पूरी तरह से नहीं दबा पाई हैं।
[56:08] ये तुम्हारी आखिरी उम्मीद है और तुम्हें हर खतरे के लिए तैयार
[56:13] रहना पड़ेगा। क्या मैं इस श्राप से छुटकारा पा
[56:17] सकता हूँ? विजय ने पूछा तांत्रिक में अपनी
[56:20] आँखों को बंद किया और कुछ मंत्र उच्चारण किए।
[56:23] फिर उन्होंने अपनी आंखें खोली और कहा कल एकादशी है।
[56:28] ये रात देवी नर्किनी और सरकटा दोनों की शक्तियां के लिए कमजोर
[56:33] होती है। उस रात तुम्हें इन मंत्रों का
[56:35] उच्चारण करना होगा। यह कहकर उसने विजय को कुछ काले
[56:40] पत्ते दिए जिनके ऊपर लाल रंग से कुछ मंत्र लिखे हुए थे।
[56:45] ये काला मंत्र है जो देवी और सरकटा।
[56:48] दोनों पर भारी पड़ेगा, लेकिन ये तुम्हे सिर्फ तब तक बचाएगा जब तक
[56:54] तुम अपना पूरा काम कर चूके होंगे। तांत्रिक ने कहा काम कौन सा काम?
[57:02] विजय ने घबराए हुए पूछा। तांत्रिक ने अपनी उंगलियों से एक
[57:06] पुराना सा मटका उठाया और विजय के हाथ में दिया।
[57:09] इस मटके में गंगाजल है। इसका प्रभाव सिर्फ तब तक होगा जब
[57:13] तुम इसे देवी नरकनी की मूर्ति पर पूरी तरह से डाल दोगे।
[57:18] तुम्हें इस जल से देवी की प्रतिमा को स्नान करवाना होगा।
[57:22] तब तक जब तक कि देवी के शरीर पर लगा हुआ खून धुल न जाए और जब ये
[57:27] हो जाए तब तुम्हें ये हथौड़ा लेना होगा।
[57:30] तांत्रिक में एक चमकता हुआ लेकिन पुराना और भारी हथौड़ा विजय को
[57:34] दिया। उस हथौड़े पर कुछ पुराने और विशेष
[57:38] प्रकार के चिन्ह बने हुए थे। इस हथौड़े से तुम्हे देवी की
[57:42] प्रतिमा के टुकड़े करने होंगे। जब तक प्रतिमा नहीं टूटेगी तब तक
[57:46] तुम्हारा ये काम पूरा नहीं होगा। देवी नर्कनी तुम्हे बहुत डराएगी,
[57:51] अपने कालरात्रि के चेहरे दिखाएगी, तुम्हारे साथ खेल खेलने की कोशिश
[57:56] करेगी, लेकिन तुम्हे डरना नहीं है।
[57:59] तुम्हे ये मंत्र जागते रहना है अगर तुम्हारे सामने सरकटा आ जाए
[58:05] तो मंत्र उच्चारण के साथ उस पर भी गंगाजल छिड़कना और वो तुम्हारा
[58:10] कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा और जब तुम्हारा काम पूरा हो जाए तो
[58:14] सिर्फ तब तुम वहाँ से निकलना। अगर तुम देवी की प्रतिमा को नष्ट
[58:19] कर पाए तो फिर सरकटे की शक्तियां भी नष्ट हो जाएंगी।
[58:25] रसाद जी ने विजय के कंधे को थपथपाया।
[58:28] तुम्हारे पास अब सिर्फ एक ही रास्ता है और यही रास्ता है विजय
[58:33] तुम्हे यही करना होगा वो पत्तो पर लिखे हुए मंत्र।
[58:36] गंगा जल से भरा हुआ मटका और वो विशेष हथौड़े को लेकर वो दोनों
[58:40] वहाँ से निकल गए। विजय ने तांत्रिक के सभी
[58:43] निर्देशों को अपने मन में बिठा लिया और अपने दिल में ये फैसला कर
[58:47] लिया कि सरकटे और देवी नरकनी के श्राप को खत्म कर ही वो तमलेगा
[58:53] विजय अपने घर लौट आया और तैयारी में जुटाया।
[58:56] उसके पास ज्यादा वक्त नहीं था। अगली रात जब पूर्णिमा के चाँद की
[59:04] रौशनी से आकाश चमक उठा तो विजय के कानो में वही आवाज़ गूंजने लगी।
[59:09] दूर इसी मंदिर में कोई आरती का नगाड़ा बजा रहा था हम धाम धाम।
[59:16] वो आवाज़ उसे साफ सुनाई दे रही थी।
[59:19] साथ ही में शंख और घंटी की आवाज़ विजय समझ गया था कि उसके गुफा में
[59:25] जाने का समय हो चुका था। एकादशी की वो रात शुरू हो चुकी
[59:30] थी। उसने हथौड़ा और मटका उठाया और
[59:33] मंत्र चार अंकलते हुए निकल पड़ा। रात का अंधेरा हर तरफ छाया हुआ
[59:38] था। विजय समझ गया था कि सरकटा देवी की
[59:42] पूजा कर रहा है। एक गहरी सांस लेकर उसने गुफा के
[59:50] एक दरवाजे से पत्थर हटाया और फिर दरवाज़ा खोल।
[59:56] मंदिर के भीतर से आने वाली आवाज़ एकदम से बंद हो गई।
[1:00:00] विजय बिल्कुल सतर्क होकर मंत्रोच्चारण करता हुआ मटके और
[1:00:05] हथौड़े के साथ धीरे धीरे सीढ़ियों से नीचे उतरा।
[1:00:11] उसने चारों तरफ़ देखा और। कांप उठा देवी नरकनी के पैरों के
[1:00:18] पास एक बिना सर और बिना उंगलियों का शरीर पड़ा हुआ था और एक कटा
[1:00:24] हुआ माथा देवी के कटोरी में था। देवी के हाथ की कटोरी खून से भरी
[1:00:30] हुई थी। और उनके गले में कटी हुई उंगलियों
[1:00:33] की माला थी। ठीक वैसी ही जैसा उसने यहाँ उस
[1:00:37] दिन भी देखा था। इतना खून था।
[1:00:39] चारों तरफ मानदेय भी खून से नहाई थी।
[1:00:43] विजय अंदर से हिल गया था। उसने चारों तरफ देखा पर सरकटा
[1:00:48] वहाँ कहीं नहीं नजर आ रहा था। ये उसके लिए एक मौका था और बिना
[1:00:53] वक्त गवाएं उसने मंत्र जाप करते हुए देवी की मूर्ति को गंगाजल से
[1:00:58] स्नान कराने लगा ताकि खून के दाग मिट जाए।
[1:01:02] लगभग आधा खून देवी के प्रतिमा से निकल ही चुका था कि अचानक एक आवाज
[1:01:07] आई क्नॉइस। मटके पर एक ज़ोर का झटका लगा और
[1:01:10] मटका वहीं टूट गया। बाकी का पूरा गंगाजल जमीन पर देता
[1:01:15] है। विजय सहनता डर के मारे उसके चेहरे
[1:01:21] से रंग उड़ गया। उसके पैरों के पास एक मानव शरीर
[1:01:25] की हड्डी पड़ी थी। जिससे वो मटका टूटा था, उसने पलट
[1:01:29] कर देखा और सामने वो सर कटा गाणा था आज सर कटा और बेबस क्योंकि
[1:01:38] उसने अपने सड़े गले सर को अपने हाथ में पकड़।
[1:01:42] उसके सामने खड़ा था, सरकटा हँस रहा था और उसकी हँसी उस गुफा में
[1:01:50] गूंज रही थी। वह समझ गया था कि जब वह मंत्रों
[1:01:54] का उच्चारण कर देवी को स्नान करा रहा था तब सरकटे में ही एक इंसानी
[1:01:59] हड्डी फेंककर मटका तोड़ दिया था। विजय समझ गया था की बहुत बड़ी
[1:02:05] अनहोनी हो चुकी है क्योंकि वो विधि को पूरा नहीं कर पाया, लेकिन
[1:02:10] देवी का स्नान अभी भी अधूरा ही था।
[1:02:14] फिर अभी उसने अपनी हिम्मत को संभाले हुए उसने मंत्रोच्चारण
[1:02:18] जारी रखा। और हथौड़ा उठाकर मूर्ति को तोड़ने
[1:02:22] के लिए उसने अपना हाथ बढ़ाया और जैसे ही उसने वो अधौरा उठाया,
[1:02:29] देवी के अंदर से एक जोरदार चीख निकली।
[1:02:35] विजय ने सामने देखा और उसके शरीर में बिजली दौड़ गई।
[1:02:39] क्नॉइस बेबी नरकनी की आँखें खुल गई थीं, उनकी आँखें बिल्कुल लाल
[1:02:48] थीं, उनके बाल हवा में उड़ रहे थे, उनके दाँतों और होठों से खून
[1:02:53] टपक रहा था और वो आठ फुट लंबी मूर्ति में मानो अब जान आ गई थी।
[1:02:58] देवी के गले से एक ऐसी चीख निकली जिसे विजय वहीं जम गया।
[1:03:05] देवी ने अपने जीभ से दाँतों पर लगे खून को साफ किया फिर अपना
[1:03:10] मुँह विजय के पास लाकर हँसते हुए बोली ये।
[1:03:14] सब। एक छल था विजय।
[1:03:17] मैं तुझे यहाँ लाई हूँ ताकि सर कटा तुझे बलि चढ़ाकर मेरी शक्ति
[1:03:22] को जागृत कर सके, तू मुझे नहीं मार सकता, फिर मैं तुझे।
[1:03:32] यार विजय के होश और मुझे समझ नहीं आ रहा था कि वो देवी के इस छल में
[1:03:36] कैसे फंस गया? अपनी बरी के लिए तैयार हो जा विजय
[1:03:42] जमींदार राघव सिंह ने मेरी बरी देवी को चराई थी, आज मैं तेरी बरी
[1:03:47] चढ़ाकर अपना बदला पूरा करूँगा और फिर खून पीकर देवी की शक्तियां
[1:03:52] जांच आएंगी। जो बली का वादा तेरे दादा ने पूरा
[1:03:56] नहीं किया वो देवी अब खुद ही पूरा करेगी।
[1:03:59] कल्याणपुर में हर अमावस्या को फिर से नरबली होगी और देवी नर्कनी को
[1:04:05] रक्त का भोग चढ़ेगा। ये कहते हुए सरकटे ने विजय को
[1:04:14] पैरों से पकड़ा, अब देवी के पैरों के सामने फेंक दिया।
[1:04:18] विजय चीख रहा था, उसकी आवाज़ गुफा में चारों तरफ गूंज रही थी, लेकिन
[1:04:23] अब उसकी सहायता के लिए कोई नहीं था।
[1:04:26] तेरे दादा ने मेरे साथ जो समझौता किया था वो उसे पूरा नहीं कर
[1:04:31] पाया। धन, दौलत, शोहरत, इन सब चीजों के
[1:04:36] बदले उसने मुझे क्या दिया? मुझे हर अमावस्या को रक्त चाहिए
[1:04:41] था, रक्त चाहिए था मुझे तेरे दादा ने मेरे सबसे बड़े भक्त।
[1:04:46] इस तंत्रिक की बलि चढ़ा दी इस छल का बदला मैंने मेरे भक्त को पुनः
[1:04:52] जीवित करके किया तू अपनी मौत का बदला तेरे दादा की बलि चढ़ाकर तब
[1:04:58] के ले चुका है वो मेरा परम भक्त है।
[1:05:02] उसने मरने के बाद भी कुछ सैकड़ों बलिया चढ़ाई।
[1:05:06] अब तेरे दादा की गलती का प्रायश्चित तू करेगा, तू करेगा
[1:05:11] विजय तेरी बलि से मैं अपनी पूर्ण शक्ति में लौटूंगी।
[1:05:17] और तेरे खून। से मैं अपनी प्यास बुझाकर स्काव
[1:05:22] के लोगों का भी रक्त ग्रहण करूँगी।
[1:05:25] सरकटा तेरा गला मुझे अर्पण करेगा जस्ट उसने तेरे दादा राघव सिंह और
[1:05:30] बाकी परिवार वालों का किया आज तेरी बलि से मैं अपनी पूर्ण शक्ति
[1:05:36] जागृत कर लूँगी। तेरा?
[1:05:38] खून मेरे लिए पूजा का प्रसाद है विजय और ये सरकटा तांत्रिक।
[1:05:44] प्रसाद की भेंट मुझे चढ़ाएगा। देवी ने एक भयंकर आवास में विजय
[1:05:53] से कहा इसके पहले की वो खुद को संभाल पाता।
[1:05:56] देवी का कड़क उठाकर सरकटे ने विजय का गला काटकर शरीर से अलग कर
[1:06:01] दिया। सरकटे की हँसी खुले गुफा में गूंज
[1:06:08] रही थी। देवी नरकनी के मुँह पर एक मुस्कान
[1:06:11] थी। सरकटे ने विजय का सिर देवी के हाथ
[1:06:15] में रखे प्याले में रखा। कुछ ही सेकंड्स में कटोरी फूल से
[1:06:18] भर गई और देवी ने उसे ग्रहण कर लिया।
[1:06:23] देवी के अंदर से एक अजीब सी काली धुंध उठी और गुफा में फैलने लगी।
[1:06:29] ऐसा लगा मानो गुफा की दीवारें कांप रही।
[1:06:32] देवी अब बुरी तरह जागरूक हो गई थी और गांव का श्राप लौट आया था।
[1:06:46] गांव के लोग अब हर अमावस्या को डर के साये में जीते हर अमावस्या की
[1:06:50] रात एक लड़की गांव के लोगों को छलसे हवेली के अंदर बुलाती है और
[1:06:54] फिर उन्हें अपना बलि बनाती है और उनके खून का प्रसाद ग्रहण करती
[1:06:59] है। सरकटा का श्राप तो खत्म हो चुका
[1:07:01] है लेकिन देवी नरकनी का श्राप अब भी गांव पर है।
[1:07:05] उस हवेली में हर अमावस्या एक नई बलि दी जाती है और देवी नरकनी की
[1:07:09] शक्ति दिन ब दिन और बढ़ती जा रही है।
[1:07:13] जो पुराना चक्र 1 दिन थमा था वो अब फिर से शुरू हो गया था।
[1:07:23] मेरा नाम साक्षी है। 4 साल पहले उस रात मैंने जो देखा
[1:07:29] उसे याद कर आज भी मेरे हाथ पैर ठंडे पड़ जाते हैं।
[1:07:33] मैं और मेरी कजिन पूनम उसके नारखंदा वाले बंगलों में थे।
[1:07:37] वो मुझसे 2 साल बड़ी है। मौसम वसे एक हफ्ते के लिए किसी
[1:07:41] शादी पर गए थे, तब उन्होंने मुझे पूनम के साथ वहाँ एक हफ्ते रहने
[1:07:46] को कहा। तीसरे दिन लंच के बाद पूनम ने
[1:07:49] अपने कपोर्ड से एक पुरानी लकड़ी का बॉक्स निकाला।
[1:07:54] एक सरप्राइज़ है देखेगी वो बहुत एक्साइटेड थी।
[1:07:58] पर जब उसने वो बॉक्स खोला, मैंने देखा कि उसमें एक ओएजा बोट था।
[1:08:04] मैंने कहीं पढ़ा था कि ओएजा बोट कॉफिन की लकड़ी से बनाए जाते हैं
[1:08:09] तो मुझे उसके पास जाने से भी डर लग रहा था।
[1:08:12] वो बोट पूनम अपने किसी फ्रेन्ड से मांग कर लाई थी, उसके कॉलेज के
[1:08:16] ज्यादातर फ्रेन्डस ने। ओयजा बोझ से प्लांचेट ट्राई किया
[1:08:20] था सब के पास प्लांचेट से रिलेटेड कोई न कोई इंटरेस्टिंग स्टोरी थी
[1:08:25] पर पूनम के पास कुछ नहीं था शेयर करने लायक।
[1:08:29] इसीलिए उसने मुझे रात को उसके साथ आत्माओं से बात करने को कहा पर
[1:08:33] मैंने साफ मना कर दिया। मुझे वैसे ही काफी डर लगता है।
[1:08:38] वो बंगलो पहाड़ों पर काफी सुनसान जगह पर था।
[1:08:42] उस पर रात के 1:00 बजे दोनों अकेले उस सुनसान घर में ये सब कौन
[1:08:47] करेगा? वो जब मुझे कन्विंस नहीं कर पाई
[1:08:50] तब उसने फ़ोन कर अपने कुछ फ्रेन्डस को रात में घर आने के
[1:08:54] लिए इन्वैट किया। मैंने तब भी उसे बहुत मना किया,
[1:08:58] पर घर उसका बोर्ड, उसका दोस्त भी उसके मेरी कहाँ चलने वाली थी?
[1:09:04] उसके सर पर तो मानो उस उलझा बोर्ड को यूज़ करने का भूत सवार था।
[1:09:09] रात को उसके दो फ्रेन्डस वहाँ आए राजीव और बाला यानी बालकृष्णन।
[1:09:14] वैसे मैं आप सबको ये पहले ही बता दूँ कि पूनम हाड फीलिंग्स फॉर
[1:09:19] राजीव बट ये सब वॅन साइडेड था। ये मैं इसलिए बता रही हूँ क्योंकि
[1:09:24] उस खौफनाक रात के साथ इस बात का बहुत बड़ा और बुरा कनेक्शन था।
[1:09:31] हँसी मजाक टाइम पास के बाद रात को 1:00 बजे हम चारों हॉल के सारे
[1:09:35] लाइट्स बंद कर चार कैनल्स चलाकर उस कोई जा वोट को टेबल पर रख उसके
[1:09:40] चारों तरफ बैठ गए। उन तीनों ने मुझे भी जबरदस्ती
[1:09:45] वहाँ बिठा दिया। बोर्ड पर ए टु ज़ी अल्फाबेट्स और
[1:09:49] 0 टु 9 नंबर्स लिखे थे। उसके अलावा तीन सर्कल्स भी थे
[1:09:54] जिसमें येस नो और होम लिखा था। होम पर एक कॉइन रखा था जीस पर हम
[1:10:00] चारों ने अपनी उंगलियां रखी थी। पूनम ने हमसे कहा कि हम चारों को
[1:10:05] मिलकर एक लाइन बार बार दोहरानी है जब तक कि वह कॉइन हिलना शुरू नहीं
[1:10:10] करता। वो लाइन थी कोई भी पवित्र आत्मा
[1:10:15] जो यहाँ से गुजर रही है, यहाँ आए हम आपसे बात करना चाहते हैं।
[1:10:21] हम चारों ने आग बंद कर वो लाइन दोहराना शुरू कर दिया।
[1:10:25] तीन 4 मिनट गुजरे होंगे। पर कॉइन में कोई हलचल नहीं थी।
[1:10:30] अचानक मुझे एहसास हुआ कि वो तीनों चुप हो गए हैं तो मैंने झट से
[1:10:35] अपनी आंख खोलकर देखा। राजीव और बाला पूनम की तरफ देख
[1:10:42] रहे थे। मैंने भी उसकी तरफ देखा।
[1:10:45] पूनम ने अपना मुँह नीचे झुका लिया था और उसका चिन्ह उसने अपने कॉलर
[1:10:49] बोन्स पर टिका कर रखा था। उसके खुले उलझे लंबे बाल उसके
[1:10:54] मुँह के सामने आ गए थे। उसके मुँह से सलाइवा गिर रहा था
[1:10:59] और वो एक अजीब सी आवाज निकाल रही थी।
[1:11:09] पूनम पूनम क्या हुआ तुझे? प्लीज़ यार अगर तू मस्ती कर रही
[1:11:15] है तो बंद कर मुझे डर लग रहा है प्लीज़ पर वो बस जा रही थी।
[1:11:21] राजीव और बाला भी खड़े हो गए और उसे जगाने की कोशिश करने लगे।
[1:11:25] तब पूनम ने धीरे धीरे अपना मुँह ऊपर किया।
[1:11:30] उसकी आँखों की पुतलियां एकदम ऊपर की तरफ थी।
[1:11:33] आँखें सफेद सी नजर आ रही थी। बाल बिखरकर मुँह पर चिपक गए थे।
[1:11:39] फिर वो एक अलग सी आवाज़ में बोली। तुम भूल गए ना मुझे राजीव तुम याद
[1:11:47] है ना मैंने तुमसे क्या कहा था याद है ना अगर तुम मेरे नहीं हो
[1:11:52] सके तो मैं तुम्हें किसी के नहीं होने दूंगी।
[1:12:03] रिया, तू तुम चली जाओ, यहाँ से वापस चली जाओ, जाओ यहाँ से रिया,
[1:12:10] तुम चली जाओ, प्लीज़। राजीव चेर से एकदम से उठकर खड़ा
[1:12:15] हो गया। फिर उसका बैलेंस बिगड़ा तो वो
[1:12:17] नीचे जमीन पर गिर पड़ा। मैं इतनी आसानी से नहीं जाने वाली
[1:12:23] राजीव तुम्हारी वजह से मेरी मौत हुई है और चार महीने भी नहीं बीते
[1:12:28] तुमने एक और लड़की पसंद कर ली, मैं पूनम को जान से मार दूंगी,
[1:12:34] मार दूंगी मैं उसे। और तुम्हें भी समझे।
[1:12:37] पूनम ने उसे अजीब सी आवाज में कहा, मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आ
[1:12:42] रहा था। ये सब चल क्या रहा था?
[1:12:45] पूनम ये किसकी आवाज में बात कर रही थी और वो खुद वो खुद को मारने
[1:12:51] की बात क्यों कर रही थी भला? और राजीव?
[1:12:54] राजीव पूनम को रिहा क्यों कह रहा था?
[1:12:56] बाला मेरी ही तरह काफी डरा हुआ था।
[1:13:00] वो अब राजीव के पीछे जाकर खड़ा था।
[1:13:04] से एक दम दूर पूनम एका एक चेयर से उठी।
[1:13:08] फिर उसने टेबल के पास खड़े पेन को उठाया।
[1:13:15] मेरे पास आओ ना जीप मेरे पास आओ डर मत।
[1:13:20] राज़ डर से जमीन पर पीछे की तरह खिसकने लगा पूनम प्लीज़ रुक जा
[1:13:26] अगर तू मजाक कर रही है तो अब बस कर यार मैं बोल रही हूँ मुझे बहुत
[1:13:31] डर लग रहा है। मुझे ये सब बिल्कुल ठीक नहीं लग
[1:13:33] रहा। पूनम, प्लीज़ मैंने पूनम से कहा।
[1:13:37] मैं पूनम नहीं रिया हूँ। पूनम ने मेरी तरफ बिना देखे जवाब
[1:13:42] दिया और ये कहकर उसने वो पेन अपनी जांघों पर स्टेप करना शुरू किया।
[1:13:49] हर बार वो पेन से एक स्टेप करती। फिर वो हंसती मानो उसे खुद को चोट
[1:13:56] पहुंचा कर मज़ा आ रहा हो, पर उसके पैरों से खून निकल रहा था, उसकी
[1:14:01] पिंक लेग्गिंग्स खून से लाल होने लगी थी।
[1:14:05] मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा था अपनी आँखों पर मेरी बहन खुद को
[1:14:09] ऐसे चोट क्यों पहुंचा रही थी? ये सब अब मुझसे नहीं देखा जा रहा
[1:14:14] था। मैंने पास जाकर उसके हाथ को
[1:14:17] पकड़कर उसे रोकने की कोशिश की पर उसने मुझे एक धक्का मारा।
[1:14:23] मैं जाकर तीन चार हाथ दूर गिर पड़ी।
[1:14:26] उसके शरीर में एक दानव जैसी ताकत थी।
[1:14:29] मेरे पूरे शरीर में बहुत ज़ोर से दर्द हो रहा था।
[1:14:32] राजीव अभी भी जमीन पर था बाला उसके साइड में कि तभी पूनम ने खुद
[1:14:38] को स्टेप करना बंद कर दिया। वो पेन उसने अपने दांतों से पकड़ा
[1:14:44] फिर जमीन पर झुकी। फिर।
[1:14:46] एक जानवर की तरह अपने हाथों पैरों के बल तोड़ते हुए वो राजीव के पास
[1:14:51] पहुंची। राजीव के पास जाकर वो उसकी छाती
[1:14:55] पर चढ़कर बैठ गई। पैन पर लगा खून उसके मुँह और
[1:14:59] तातों पर लग चुका था। उसे देख कर सबकी हालत और खराब हो
[1:15:04] रही थी। फिर वो राजीव से बोली।
[1:15:08] फूलों को गर्लफ्रेंड में आने की सोच रहे हो ना तुम ऐसा करने की
[1:15:12] बिलकुल मत सोचना नहीं बना पाओगे मैं उसे मार दूंगी, मार दूंगी
[1:15:21] उससे मैं और तुम्हें भी। ये कह कर उसने उस पेन से।
[1:15:25] राजीव के शरीर पर स्टेप करना शुरू किया।
[1:15:28] राजीव दर्द से चिल्लाने लगा। पूनम या फिर या कहूं पता नहीं
[1:15:34] स्टेप करते वक्त वो ज़ोर ज़ोर से हंस रही थी।
[1:15:37] मेरे पैरों में अब कोई ताकत नहीं थी।
[1:15:40] ये सब क्या चल रहा था, मुझे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था।
[1:15:44] पर एक बात मैं समझ चुकी थी, अगर मैं इसी तरह खड़ी रही तो पूनम
[1:15:49] राजीवर अपने आप को बुरी तरह से घायल कर देगी।
[1:15:53] मैंने आसपास देखा, सोफा पर एक शॉल पड़ा था।
[1:15:57] मैंने भाग कर जाकर शॉल उठाया और पूनम के पीछे से जाकर उसके सर्प
[1:16:02] और शरीर पर शॉल लिपटा दिया। फिर उसको पीछे से पकड़ कर मैं उसे
[1:16:07] राजीव के ऊपर से हटाने की कोशिश करने लगी।
[1:16:11] वो एक जंगली जानवर जैसे छटपटाने लगी।
[1:16:14] खुद को छुड़ाने के लिए वो अभी भी गुजरा रही थी।
[1:16:27] वो गुस्से में कुछ बोल रही थी पर मैं नहीं रुकी।
[1:16:31] मैंने उसे कसकर पकड़े रखा। मुझे ऐसा करते देख शायद बाला में
[1:16:36] भी थोड़ी हिम्मत आई और वो मेरे साथ पूनम को पकड़ कर उसे राजीव के
[1:16:41] शरीर से हटाने लगा। हम दोनों उसे खींचते हुए वाशरूम
[1:16:46] ले गए और उसके सर पर पानी डालने लगे।
[1:16:50] रिया तुम वापस चली जाओ, रिया वापस चली जाओ, वापस चली जाओ, पूनम कुछ
[1:16:55] छोड़ दो, रिया वापस चली जाओ, चली जाओ, पूनम कुछ छोड़ दो, रिया, मैं
[1:17:01] और बाला। पानी डालते डालते चिल्ला रहे थे,
[1:17:04] वो फिर भी चिल्लाते और छटपटाती रही।
[1:17:08] फिर धीरे धीरे पूनम शांत हो गई। हम दोनों ने उसे बाथरूम से बाहर
[1:17:14] निकाला और बैडरूम में ले जाकर सुला दिया।
[1:17:18] वो तभी भी कुछ बोल रही थी, पता नहीं क्या?
[1:17:22] फिर हम दोनों राजीव के पास गए उआ चेयर पर उठकर बैठ गया था।
[1:17:27] वो काफी दर्द में था पर बेहोश नहीं हुआ था।
[1:17:31] पूनम ने उसके हाथों और शरीर पर कई जगह पर पेंसें घाव किए थे।
[1:17:35] घाव गहरे नहीं थे पर खून निकल रहा था हम दोनों ने।
[1:17:40] उसे बिठाकर उसका फर्स्ट डेट किया। कुछ देर बाद जब उसकी हालत थोड़ी
[1:17:45] ठीक थी तब मैंने उससे पूछा राजीव रिया कौन है?
[1:17:50] मुझे प्लीज़ थोड़ा बताओ, मुझे नहीं समझ में आ रहा आज क्या चल
[1:17:54] रहा है। वह पहले चुप रहा, फिर वह रोने
[1:17:58] लगा। तब बाला ने मुझे बताया।
[1:18:00] कि रिया राजीव की गर्लफ्रेंड थी। वो राजीव को लेकर बहुत जैसे थी।
[1:18:07] हर वक्त उस पर छोटी छोटी बातों को लेकर शक किया करती थी।
[1:18:11] जब राजीव ने उससे ब्रेकअप करने की कोशिश की तो उसने अपनी नस काट ली।
[1:18:17] चार महीने हो गए थे। उसके स्विसाइड को और बस यही नहीं
[1:18:22] स्विसाइड करने से पहले उसने राजीव को धमकी भरा मैसेज किया था।
[1:18:28] अगर तुम मेरे नहीं हो सके तो मैं तुम्हें किसी की नहीं होने दूंगी।
[1:18:34] ये सब सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे।
[1:18:39] इसका मतलब मरने के बाद या जहाँ भी थी राजीव पर फिर भी नजर रखे हुए
[1:18:45] थे। उसको राजीव और पूनम की दोस्ती पर
[1:18:49] शक था। शायद इसीलिए वो राजीव और पूनम से
[1:18:52] बदला लेना चाहती थी और ओयजाबोट की वजह से।
[1:18:57] रिया की आत्मा वापस आ गई, वो भी पूनम के अंदर वो रात और उसके बाद
[1:19:05] के कुछ दिन हम लोगों ने कैसे बिताए ये मुझे ही बताया।
[1:19:09] आज 4 साल बीत चूके हैं इस हादसे को पर पूनम आज भी।
[1:19:15] काफी शांत रहती है और यह उसका क्या हुआ, क्या वो वापस चली गई?
[1:19:23] पता नहीं पर मुझे लगता है कि वो आज भी पूनम के अंदर ही है और
[1:19:29] राजीव पर नजर रखे हुए हैं। रघुवीर और उसकी टीम मध्यप्रदेश के
[1:19:37] मंडाला डिस्ट्रिक्ट के घने जंगलों में थी, जिसमें कुछ एक्सपर्ट्स
[1:19:41] बंदूकों से लैस और बाइगा जनजाति के कुछ लोग गवर्नमेंट की तरफ से
[1:19:46] आए हुए थे। जंगल में पाए जाने वाले मच्छरों
[1:19:49] के रिसर्च के लिए इस जंगल में ये टीम भेजी गई थी।
[1:19:53] उन्हें यहाँ से जंगल के अलग अलग हिस्सों में जाकर ज्यादा से
[1:19:56] ज्यादा सैंपल्स इकट्ठे करने थे। लेकिन आज सैंपल कलेक्शंस के टाइम
[1:20:00] जब रघुवीर ने ब्रेक लिया, तब उसने देखा कि रामधन और सुखनंदन जंगल के
[1:20:05] एक ऊंचे पेड़ की तरफ मुँह उठाकर एक तक देख रहे थे।
[1:20:10] रामधन तो मानो मूर्ति की तरह एक जगह जमा हुआ था, जब कुछ मिनटों
[1:20:16] बाद सुखनंदन लौटा, तब उसने कहा, हमें इस इलाके में ज्यादा देर
[1:20:21] नहीं रहना चाहिए। बाबूजी ये जगह ठीक नहीं है, भगवान
[1:20:24] सब की रक्षा करे। क्यों क्या हुआ और तुम दोनों वह
[1:20:28] पेड़ पे क्या देख रहे थे? बाबूजी आप विश्वास नहीं करोगे?
[1:20:33] लेकिन ये वही इलाका है जहाँ रामधन के भाई की मौत हुई थी और वो पेड़
[1:20:38] ये वही पेड़ था जहाँ उस काली चुड़ैल के पैरों के निशान गायब हो
[1:20:43] गए थे। सुखनंदन बैगा जनजाति से था।
[1:20:47] वो सामान ढोने, टेंट लगाने और बाकी दूसरे काम के लिए रघुवीर के
[1:20:51] साथ था। कुछ दिन पहले एक रात सुखनंदन ने
[1:20:54] जंगलों की कहानियों सुनाते हुए उसे रामधन की भी कहानी सुनाई थी।
[1:20:58] बाबू जी आप लोग पढ़े लिखे हो इसलिए शायद आप लोग ऐसी बातों पर
[1:21:02] विश्वास नहीं करते। पर इस जंगल में शेर चीतों से बहुत
[1:21:06] ज्यादा डरावना भी कोई हैं। बगल वाले टेंट में जो रामधन हैं,
[1:21:11] उसके भाई को मार दिया था। उसने उसके दोनों पैर भी ले गयी।
[1:21:15] वो पैर ले गए। इसका क्या मतलब हैं?
[1:21:19] रघुवीर ने कहा 3 साल पहले की घटना हैं।
[1:21:23] जंगल की नदी पर ब्रिज बन रहा था और रामधन और उसका भाई तभी इसी
[1:21:28] साइड में काम करने गए थे। एक रात गर्मी बहुत सारा थी तो
[1:21:32] रामधन और उसका भाई एक खुली जगह देख दूसरों से अलग जाके सो गए।
[1:21:37] रामधन को रात में हल्का होना था तो वो नींद से उठकर पास में
[1:21:41] झाड़ियों की तरफ चला गया। अचानक उसके भाई के चीख से जंगल
[1:21:46] कांप उठा। रामधन भागकर वहाँ गया, उसने देखा
[1:21:53] उसके भाई का एक पैर घुटने से नीचे और दूसरा पैर जांघो से गायब था।
[1:21:59] वो दर्द से तड़प रहा था। उसके पैर का मांस कई जगह से लटक
[1:22:03] रहा था और और वहाँ चारों तरफ खून ही खून था ने खून से होली खेली
[1:22:09] हो। कुछ ही मिनटों में उसकी मौत हो
[1:22:12] गई। ये शेर या चीता होगा?
[1:22:15] फिर तुम लोग फालतू में ही कुछ और सोच रहे हो नहीं बाबूजी सभी को
[1:22:20] पहले यही लगा था कि शेर है पर वहाँ ना किसी जानवर के पैरों के
[1:22:24] निशान मिले और ना ही शिकार को घसीटने के कोई निशान थे।
[1:22:28] बस आधा हाथ लंबा इंसान के पैर जैसा कोई निशान था, बहुत हल्का और
[1:22:33] पतला और वो निशान एक पेड़ के सामने जाकर गायब हो गया मानो कोई
[1:22:39] पेड़ पर चढ़ गया हो। बाद में जब डॉक्टर की रिपोर्ट आई
[1:22:43] तो पता चला शरीर से आधे से ज्यादा खून बह चुका था।
[1:22:46] क्नॉइस अब आप ही बोलो एक इंसान का पैर काट कर कोई जानवर क्यों लेके
[1:22:50] जाएगा? उसमें तो हड्डी ज्यादा होती है और
[1:22:52] मांस कम है ना बाबू जी शेर चीतों में इतनी ताकत होती है कि वह पूरे
[1:22:58] इंसान को अपने जबड़े में दबोच कर ले जाए पर पैर छोड़ के और कोई चोट
[1:23:03] के निशान नहीं थे। उसके भाई के शरीर पर ना गर्दन पर।
[1:23:07] रामधन हल्का होने के लिए सिर्फ 5 मिनट के लिए गया होगा तो उतने समय
[1:23:11] में कोई जानवर आराम से पूरा शरीर लेकर गायब हो सकता था, लेकिन खाली
[1:23:16] पैरों को काट कर क्यों ले जाएगा? वो जो कुछ भी था, उसके जबड़ों में
[1:23:21] बहुत ताकत थी। तभी अपने दांतों से पैर की हड्डी
[1:23:25] को भी अलग कर पाई थी। वो वो वहीं बैठकर अपने शिकार को
[1:23:29] खाना चाहती थी, पर रामधन की आवाज सुनकर वो भाग गई।
[1:23:34] उस दिन से वहाँ काम बंद हो गया। तब से हमारे गांव के लोगों ने रात
[1:23:39] में जंगल में आना ही बंद कर दिया है।
[1:23:42] खाना चाहती थी। तुम तो ऐसे बोल रहे हो जैसे कि
[1:23:45] कोई लड़की ने उसका शिकार किया हो। रघुवीर ने कहा बाबू जी बहुत लोग
[1:23:51] उसको काली चुड़ैल कहते हैं, वो इंसानों का शिकार करती है,
[1:23:55] थपेड़ों पर रहती है वो क्या पता, आज भी वो यही आसपास गई हो क्नॉइस
[1:24:01] रघुवीर ने सुखनंदन से उस रात और कोई तर्क नहीं किया।
[1:24:06] उसे पता था गांव के लोग चुडैल, भूत, पिशाच इन सब चीजों में मानते
[1:24:10] थे। वो इस घटना को कहानी समझ कर भूल
[1:24:14] गया पर आज अचानक फील्ड पर फिर से दोबारा वही बात सुन रघुवीर को कुछ
[1:24:21] अजीब सा लगने लगा। उसने मन ही मन सोचा की ये लोग
[1:24:24] काफी अंधविश्वासी है पर उसे पता था की उसे और उसके टीम को सतर्क
[1:24:29] रहना पड़ेगा। हो सकता है वो आदमखोर जानवर आज भी
[1:24:33] इसी इलाके में हो। उस रात सुखनंदन शांति रहा।
[1:24:38] उसे देख कर पता चल रहा था की वो डरा हुआ है।
[1:24:41] ज़रा सी आवाज होने पर वो बार बार उठ के बैठ जाता।
[1:24:48] अगले दिन दोपहर करीब साढ़े 3:00 बजे रघुवीर और उसकी टीम सैंपल्स
[1:24:52] कलेक्ट करके कैंप में लौट रही थी। रोज़ 4:00 बजे तक उन सबको टेंट
[1:24:57] में लौटना होता। सिर्फ दिन की रौशनी में ही काम
[1:25:00] करना अलाउड था। वो जंगल के जीस हिस्से में थे।
[1:25:04] वह एक प्रोटेक्टेड एरिया था और वहाँ काम करने के कुछ कठोर नियम
[1:25:09] थे सैंपल्स कलेक्ट करने, यहाँ तक कि हल्का होने के लिए भी एक
[1:25:13] फॉरस्ट गार्डन के साथ हमेशा होना कंपलसरी था।
[1:25:16] धीरे धीरे अँधेरा छा रहा था। तप ही अचानक पूरे जंगल में एक
[1:25:21] आदमी की चीख गूंज उठी। अफरा तफरी मच गयी।
[1:25:28] चारो तरफ सारे लोग उस आवाज़ की तरफ भागे पर किसी को कुछ भी नहीं
[1:25:33] दिखा। फॉरेस्ट गार्ड ने हेड काउंट किया
[1:25:35] तो पता चला की रामधन गायब था। रौशनी अब धीरे धीरे और कम हो रही
[1:25:41] थी। बाहर इस तरह रहना बिलकुल सेफ नहीं
[1:25:44] था, पर वो रामधन को छोड़ के जा भी नहीं सकते थे।
[1:25:48] तब सभी ने डिसाइड किया तीन टीम्स बनाई और उसे ढूंढने के लिए निकल
[1:25:52] पड़े। हर टीम में बंदूक से लैस फॉरस्ट
[1:25:56] गार्ड्स भी थे। सांव यहाँ जल्दी 1015 मिनट बाद एक
[1:26:05] फॉरस्ट गार्ड की आवाज आई। उसकी चीक से सब उसी तरह भागे।
[1:26:10] एक पेड़ के नीचे रामधन की लाश पड़ी मिली।
[1:26:13] उसका बाया हाथ कंधे से गायब था। मानो किसी जानवर ने उसे दांतों से
[1:26:19] उखाड़ कर अलग कर दिया हो। वहाँ चारों तरफ खून फैला हुआ था,
[1:26:25] यहाँ तक कि आसपास के थपेड़ों के तनों पर भी।
[1:26:28] पर हैरानी की बात यह थी कि जमीन पर किसी जानवर के पैरों के निशान
[1:26:33] नहीं थे। उन लोगों के अलावा।
[1:26:36] बस जमीन खून से गीली हो चुकी थी। अचानक एक फॉरेस्ट ऑफिसर जमीन पर
[1:26:42] झुक कर कुछ देखने लगा। रघुवेश ने पास जाकर देखा वहाँ 910
[1:26:48] इंच लम्बे कुछ पैरों के निशान थे। उस पैर में इंसानों की तरह पांच
[1:26:53] ही उंगलियां थी पर निशान पतले? और हल्के थे वो सब उस निशान को
[1:26:59] फॉलो करने लगे। वो निशान एक पेड़ के पास जाकर
[1:27:03] गायब हो गया मानो वो जानवर शिकार कर पेड़ पर चढ़ गया था।
[1:27:08] पेड़ पर खून के निशान भी थे। रघुवीर को सुखनंदन की कहानी याद आ
[1:27:13] रही थी। अब।
[1:27:14] रामधन के भाई के साथ भी तो ऐसा ही कुछ हुआ था कि तभी थपेड़ों से एक
[1:27:19] सरसराहट की आवाज़ आई और अगले ही पल पास के किसी पेड़ से एक विवाद
[1:27:24] से चितकार ये किसी जानवर की आवाज़ नहीं थी पर बहुत ही डरावनी थी।
[1:27:32] सब डर से चिल्लाते हुए भागने लगे। रघुवीर ने तो पेड़ की तरफ देखने
[1:27:36] की भी कोशिश की पर उसे कम रौशनी में कुछ नहीं दिखाई दिया।
[1:27:40] फॉरस्ट गार्ड्स ने हवा में कुछ फाइरिंग की और सब लोगों को कैंप
[1:27:49] की तरफ जाने के लिए कहा। सभी उसी तरफ भागने लगे।
[1:27:53] क्नॉइस। बदकिस्मती से इसी अफरा तफरी में
[1:27:55] रामधन का शरीर वहीं रह गया। कैंप में वापस आकर सब डर से कांप
[1:28:03] रहे थे। सभी को वापस घर जाना था पर बाहर
[1:28:06] अँधेरा हो चुका था और आज वापस लौटने का तो कोई सवाल ही नहीं था।
[1:28:10] रघुवीर को अभी भी विश्वास नहीं हो रहा था।
[1:28:14] अभी जो हुआ इसका मतलब सुखनन्दन ने जो उसे कुछ दिन पहले कहा था वो सच
[1:28:19] में हुआ था। कुछ तो था जंगल में उन थपेड़ों पर
[1:28:25] और वो आवाज़, वो आवाज़ किसी जानवर की तो हो ही नहीं सकती।
[1:28:30] उस आवाज को याद कर रघुवीर अब भीतर से कांप रहा था।
[1:28:34] जंगल की वो जगह जहाँ आज ये घटना घटी थी वो कैंप से ज्यादा दूर
[1:28:39] नहीं थी। रात को इसीलिए ये फैसला लिया गया
[1:28:42] कि सब लोग एक साथ इक्विपमेंट वाले बड़े प्रिंट में रहेंगे।
[1:28:47] गार्ड्स के पास बंदूक थी। और वो पूरी रात बारी बारी बहरा
[1:28:51] देंगे। रात के 12:01 बजे तक सब जाग रहे
[1:28:56] थे और धीरे धीरे सबकी आँखें बंद होने लगी।
[1:28:59] सारे दिन की भागदौड़ से सब अब थक चूके थे उस पर सुखनंदन और बाकी के
[1:29:05] बैगा जनजाति के लोगों ने। दर कम करने के लिए थोड़ी शराब भी
[1:29:09] पीली थी। टेंट के दरवाजे के पास एक गाठ
[1:29:13] बंदूक लिए बैठा था। बाकी के गार्ड्स टेंट के बाकी के
[1:29:17] हिस्सों में बंदूक लिए चक्कर मार रहे थे।
[1:29:20] करीब तीन साढ़े 3:00 बजे एक खिसक ने की आवाज से रघुवीर की अचानक
[1:29:25] आंख खुली। वो कोने के बल उठा और देखने लगा
[1:29:35] कि ये आवाज कहाँ से आ रही थी, सब लोग सो रहे थे।
[1:29:39] गार्ड्स भी आधे से ज्यादा लैम्प्स भी पूछ चुकी थी।
[1:29:43] तभी उसकी नजर सुखनंदन पर पड़ी। वो उसकी तरफ बड़ी बड़ी आंख कर देख
[1:29:49] कुछ इशारा कर रहा था। वो अपने होठों पर ऊँगली रख रघुवीर
[1:29:54] को शांत रहने को कह रहा था। फिर टेंट के दरवाजे के पास सोए
[1:29:58] हुए घाट की तरफ उसने इशारा किया, रघुवीर ने उस तरफ देखा।
[1:30:03] उस घाट का एक पैर कमर से नीचे हवा में ऊपर उठा हुआ था, मानो किसी ने
[1:30:08] उसके पैर पकड़ रखे हो। वो जो कुछ भी था वो उस घाट के
[1:30:12] शरीर को धीरे धीरे खींच रहा था। टेंट से बाहर उसने ध्यान से देखा
[1:30:20] टेंट के दरवाजे के पास मानो कोई। पेड़ खड़ा था।
[1:30:24] एक बहुत ऊंचा काला साया, जिसकी शक्ल एक विकृत औरत जैसी थी और
[1:30:30] उसके हाथ पैर पेड़ के जड़ों की तरफ है।
[1:30:36] उस अंधेरे में भी उसकी आंखें चल रही थी।
[1:30:40] वो उस घाट के पैर को पकड़कर उसे टेंट के बाहर ले जाने की कोशिश कर
[1:30:45] रही थी। गार्ड अब भी होश में नहीं आया था।
[1:30:49] शायद उसने भी पी रखी थी। ये सब होता देख रघुवीर झट से उठा
[1:30:53] अपने सर के पास रखे टॉर्च से उसने उस घाट के शरीर की तरफ दे मारा।
[1:30:58] डॉट शरीर से टकराने पर गार्ड अचानक से होश में आया।
[1:31:02] जैसे ही गार्ड ने उस आकृति को देखा वह चिल्लाते हुए खुद को
[1:31:05] छुड़ाने की कोशिश करने लगा। उस आकृति ने रघुवीर की तरफ देखा,
[1:31:10] वो घुरला रही थी। उसके वो काले विकृत चेहरे पर लाल
[1:31:14] आँखें मान में जल रही थी। उसने गुस्से से एक जोरदार
[1:31:18] चित्तकार दी जिससे कैंप में हुए बाकी सभी लोग जाकर उस पेड़ जैसे
[1:31:25] चुड़ैल को देख डेंट में सब लोग घर से चिल्लाने लगे।
[1:31:28] सब दरवाज़े से दूर भागने लगे, पर उस आकृति ने गार्ड के पैरों को
[1:31:33] नहीं छोड़ा। अचानक उसने अपना मुँह खोला।
[1:31:39] उसका जबड़ा इतना बड़ा था कि इंसान का सिर भी शायद उसमें आसानी से
[1:31:43] समा सकता था। उसने गार्ड को पैरों से पकड़ हवा
[1:31:47] में उठा लिया। फिर उसने अपने दांतों से एक पैर
[1:31:50] को घुटने के पास से पकड़ा। और अपने दांतों से खींच कर घुटने
[1:31:54] से अलग कर दिया। खून के चीड़े आगे खड़े लोगों के
[1:32:02] मुँह पर जा गिर गए। गांठ चिल्लाए जा रहा था, दर्द से
[1:32:06] छटपटाने लगा। फिर वो जमीन पर गिर पड़ा।
[1:32:11] कुछ मिनटों में ही उस आकृति ने फॉरेस्ट गार्ड का पैर हड्डी समेत
[1:32:15] खा लिया। ये खौफनाक दृश्य देख और गार्ड की
[1:32:20] वो खौफनाक चीख सुन सब लोग कांपने रोने लगे।
[1:32:25] गार्ड छटपटा रहा। मदद मांग रहा था।
[1:32:28] सबसे पर सब इतने डरे हुए थे की कोई कुछ करने की हिम्मत ही नहीं
[1:32:32] कर पा रहे थे और इस में नहीं उस पेड़ जैसे आकृति ने अब उस गाट के
[1:32:38] दूसरे पैर को पकड़ा और खींचते हुए उसे बाहर ले गई।
[1:32:42] चारों तरफ खून फैला हुआ था। अचानक उस गार्ड की एक और दर्दनाक
[1:32:46] चितकार से पूरा जंगल गूंज उठा। सबका दिल दहल उठा।
[1:32:55] फिर गार्ड की आवाज आनी बंद हो गई। खसेटने की आवाज भी अब धीरे धीरे
[1:33:02] जंगल में कही समा गई। उस रात आतंक का वो दृश्य जो सब ने
[1:33:07] देखा उसने सबको अंदर तक झकझोर दिया।
[1:33:14] सुबह होने पर कुछ लोग उस घाट को ढूंढने गए।
[1:33:18] उन्हें दूर एक पेड़ के डाली पर घाट का सिर।
[1:33:21] फेफड़ों से ऊपर वाला हिस्सा हिला। बाकी पूरा शरीर गायब था।
[1:33:27] दोनों लाशों को कैंप में लाने के बाद वो लोग उसी दिन वहाँ से लौट
[1:33:31] गए। ऑफिसियल रिपोर्ट में ये बताया गया
[1:33:33] कि एक आदमखोर जानवर के अटैक की वजह से रिसर्च एक्स्पेटिशन को
[1:33:38] कैंसिल करना पड़ा। रघुवीर एक साइंटिस्ट था।
[1:33:41] पर जो उसने उस दिन देखा, उसका कोई लॉजिकल एक्सप्लेनेशन उसके पास आज
[1:33:46] भी नहीं था। वो आकृति इंसानों को खाने वाला
[1:33:50] चलता फिरता पेड़ था या एक काली चुड़ैल, ये रहस्य उस जंगल के
[1:33:57] अंधेरों में कहीं खो गया। ही गाइस आज की कहानी यहीं पे खत्म
[1:34:05] होती है अपना और अपनी फैमिली का बहुत ध्यान रखिए।
[1:34:08] अगले हफ्ते फिर मुलाकात होगी। सुनते रहिए स्पूक कास्ट अवि और
[1:34:15] मंजिला के साथ।

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